जोशीमठ, [रणजीत सिंह रावत]: उत्तराखंड में जून, 2013 में आई आपदा का भयावह मंजर आज भी चमोली जिले की उर्गम घाटी के लोगों के जेहन में ताजा है। इस आपदा ने उर्गम घाटी में ग्रामीणों के घर, गोशाला, मवेशी व कृषि योग्य भूमि को ही नहीं लीला, सड़क और पुलों को भी तबाह कर डाला था। तब जनमैत्री कल्पघाटी युवा समिति घाटी के लिए देवदूत बनकर सामने आई। 

समिति ने क्षेत्र का सर्वे कर सर्वाधिक प्रभावित दस परिवारों को इंटेल फाउंडेशन दिल्ली के सहयोग से 22-22 हजार रुपये मूल्य की एक-एक हॉर्स पावर क्षमता वाली आटा चक्की प्रदान की। आज यही चक्कियां घाटी के 600 परिवारों के लिए वरदान बन गई हैं। 

मिला संबल, खुली आजीविका की राह 

आपदा के बाद उर्गम घाटी में ग्रामीणों के पास रोजगार का कोई साधन नहीं रह गया था। सारे घराट (पनचक्की) आपदा की भेंट चढ़ चुके थे। सड़क व पैदल मार्ग व पुलों के बह जाने से अनाज पिसाने के लिए जाना संभव नहीं था। लेकिन जुलाई, 2013 में समिति की ओर से दी गई इन चक्कियों ने महिलाओं को संबल तो दिया ही, उनकी आजीविका की राह भी खोल दी।

शुरुआत में उन्होंने प्रतिदिन 400 से 500 रुपये गेहूं, मसालों आदि की पिसाई से कमाए। घाटी के ल्यारी थैणा, बड़गिंडा, देवग्राम, गीरा, बांसा, तल्ला बड़गिंडा, भर्की, पिल्खी व अरोसी आदि गांवों के प्रभावित परिवारों को इसका लाभ मिल रहा है। 

हो जाती है 5000 रुपये तक की आमदनी

लाभार्थी यशोदा देवी बताती हैं कि आपदा के बाद हमारे परिवार सड़क पर आ गए थे। ऐसे मे घर की माली हालात सुधारने में चक्की ने बड़ा  काम  किया। अब इस चक्की पर हम प्रतिदिन एक क्विंटल तक गेहूं व मसाले पीस लेते हैं। 

इससे महीने में 5000 रुपये से अधिक की आमदनी आसानी से हो जाती है। वह बताती हैं कि पहले उर्गम घाटी के लोगों को अनाज व मसालों को पिसाने के लिए 18 किमी दूर जोशीमठ ले जाना पड़ता था, लेकिन अब जोशीमठ से व्यापारी हमारे पास आ रहे हैं। 

उत्पादों की गुणवत्ता ने कायम किया विश्वास 

जनमैत्री कल्पघाटी युवा समिति के सचिव प्रदीप सिंह चौहान कहते हैं कि बीते पांच वर्षों में लोग इन चक्कियों की बदौलत 15 लाख रुपये तक की आय अर्जित कर चुके हैं। आटे और मसालों की गुणवत्ता से व्यापारियों का भी उन पर विश्वास कायम हुआ है। चौहान बताते हैं कि उर्गम घाटी के लगभग 600 परिवार तैयार किए उत्पाद बाजार में अच्छे मूल्य पर बेच रहे हैं। 

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By Bhanu