12 वर्ष से चला आ रहा सन्नाटा, चौसिंग्या खाडू की अगुआई में पातर नचौणियां पहुंची मां नंदा की बड़ी जात
चौसिंग्या खाडू की अगुआई में मां नंदा की बड़ी जात 12 साल बाद पातर नचौणियां पहुंची, जहां जगह कम पड़ने पर भक्त भगुवाबासा में ठहरे।


समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
संवाद सहयोगी, गोपेश्वर। चौसिंग्या खाडू की अगुआई में मां नंदा की बड़ी जात शुक्रवार को वेदनी बुग्याल से कैलुवा विनायक होते हुए पातर नचौणियां पहुंच गई। यात्रा में हजारों श्रद्धालु शामिल हैं, इसलिए पातर नचौणियां में जगह कम पड़ने के कारण उन्हें वहां से दो किमी आगे भगुवाबासा में ठहराया गया। इससे पहले, वेदनी कुंड में श्रद्धालुओं ने पितरों के निमित्त तर्पण किया।
बड़ी जात के वाण से आगे बढ़ते ही निर्जन पड़ावों पर 12 वर्षों से चला आ रहा सन्नाटा टूट गया है। शुक्रवार को मौसम भी नंदा भक्तों पर मेहरबान रहा, जिससे उनके चेहरे खिल उठे। शनिवार को नंदा की डोली पातर नचौणियां से छेड़ी नाग, रूपकुंड ज्यूरांगली व थाला उलारी होते हुए रात्रि विश्राम के लिए शिला समुद्र पहुंचेगी। पहली बार बड़ी जात में महिलाएं भी शामिल हैं। इससे पहले कभी महिलाएं बड़ी जात का हिस्सा नहीं रहीं।
ब्रह्मकमल देख अभिभूत हुए नंदा भक्त
नंदा पथ पर कैलुवा विनायक से भगुवबासा तक देव पुष्प ब्रह्मकमल अपनी सुंदरता बिखेर रहा है। ब्रह्मकमल मां नंदा को भी अतिप्रिय है। पिछले दिनों रूपकुंड-भगुवाबासा का भ्रमण कर लौटे पर्यावरण प्रेमी चंदन नयाल ने बताया कि वर्षों बाद नंदा पथ पर ब्रह्मकमल की भरमार दिख रही है।
बड़ी जात व लोकजात के अलावा जन्माष्टमी से लेकर नंदाष्टमी तक मनाए जाने वाले सैलपाती कौथिग और नंदा अष्टमी कौथिग के दौरान मां नंदा की पूजा ब्रह्मकमल से ही की जाती है। पंचकेदार मंदिरों में इसी पुष्प से बाबा केदार की पूजा होती है। 12 वर्ष में आयोजित बड़ी जात का तो यह सबसे बड़ा प्रसाद माना जाता है।
इसलिए पड़ा पड़ाव का पातर नचौणियां नाम
पातर नचौणियां का अर्थ है नर्तकियों के नाचने का स्थान। कहते हैं कि 14वीं सदी में कन्नौज के राजा जसधवल अपनी रानी और लश्कर के साथ नंदा देवी की यात्रा पर निकले थे। यात्रा के नियम और नंदा पथ की पवित्रता का उल्लंघन करते हुए राजा ने इस बेहद दुर्गम स्थान पर मनोरंजन के लिए नर्तकियों (पातरों) का नाच-गाना रखवाया। इसीलिए कालांतर में इस स्थान को पातर नचौणियां नाम से पहचान मिली।
