एशिया की सबसे लंबी धार्मिक यात्रा, 280 किमी पैदल दूरी और 20 पड़ाव... 12 साल बाद होता है आयोजन
Uttarakhand Nanda Devi Yatra News: नंदा देवी राजजात उत्तराखंड के चमोली में 12 साल बाद आयोजित होने वाली एशिया की सबसे लंबी धार्मिक यात्रा है।
HighLights
नंदा देवी राजजात एशिया की सबसे लंबी धार्मिक यात्रा
उत्तराखंड के चमोली में 12 साल बाद होता है आयोजन
280 किमी पैदल, 20 पड़ाव, चौसिंग्या खाडू अगुआई
निर्मला बोहरा, उत्तराखंड। Nanda Devi Raj Jat Yatra: नंदा देवी राजजात एशिया की सबसे लंबी धार्मिक यात्रा है। जिसे हिमालयी महाकुंभ भी कहा जाता है। उत्तराखंड के चमोली जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्र में 12 साल बाद नंदा देवी राजजात का आयोजन किया जाता है।
280 किमी लंबी यह धार्मिक पैदल यात्रा 20 पड़ावों से होकर गुजरती है। जिनमें पांच पड़ाव निर्जन एवं दुर्गम हैं। यात्रा की अगुआई चौसिंग्या खाडू (चार सींग वाला मेढ़ा) करता है। उसे नंदा देवी नंदा के साथ कैलास के लिए विदा किया जाता है।

20 दिन की यात्रा
यह यात्रा 20 दिन की होती है और चमोली के नौटी स्थित नंदा देवी मंदिर से शुरू होकर समुद्रतल से 14,600 फीट की ऊंचाई से होते हुए होमकुंड पहुंचकर पूर्ण होती है।
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ये है मान्यता
मान्यता है कि हिमवंत और मैणा की सात पुत्रियों में सबसे छोटी नंदा का विवाह कैलासवासी शिव से किया गया था। 12 वर्ष तक जब पिता हिमवंत ने नंदा की कोई सुध नहीं ली तो उसने माता-पिता को पुकारा। उसके आसूं धरती पर गिर गए, जिससे पिता के देश में उथल-पुथल मच गई। वह चिंतित होकर महर्षि नारद के पास पहुंचे। नारद ने उन्हें सलाह दी कि हेमंत ऋतु में सौगात लेकर नंदा को मनाने जाएं। तब से वार्षिक जात नंदा कुरुड़ का आयोजन किया जाता है।
क्या है इतिहास?
ऐसा माना जाता है कि नंदा देवी राजजाता यात्रा की शुरुआत चमोली गढ़वाल के राजा शालिपाल सातवीं शताब्दी में हुई थी। शालिपाल ने कई यात्राओं को मिलाकर भव्य यात्रा का आयोजन किया। इसके कुमार (कुंवर) परिवार ने नंदा देवी राजजात का कार्यभार संभाला। करीब तीन सौ सालों से वहीं इस यात्रा आयोजन करवाते आ रहे हैं।
कब-कब आयोजित हुई राजरात
- 1843 पहली बार संगठित रूप में दस्तावेजीकरण
- 1863
- 1886
- 1905
- 1925
- 1951
- 1996
- 1987
- 2000
- 2014
- 2026
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चौसिंग्या खाडू दिखाता है रास्ता
नंदा देवी यात्रा का पथ प्रदर्शक चौसिंग्या खाडू (मेढ़ा) होता है। इसकी चार सींग होती हैं। यही अकेला प्राणी होता है जो नौटी से होमकुंड तक राजजात यात्रा की अगुवाई करता है। चौसिंग्या खाडू की पीठ पर लादकर मां नंदा को कैलास पहुंचाया जाता है। सालों से चली आ रही परंपरा को निभाने के लिए कांसुवा के कुंवर रिंगाल की छाता बनवाकर चौसिंग्या खाडू सहित नौटी आते हैं। इसी पर देवी की सोने की प्रतिमा रखी जाती है।
