उत्तराखंड के बदियाकोट आदिबद्री मंदिर में लगी भीषण आग, दानपुर की सदियों पुरानी आस्था का केंद्र राख
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बदियाकोट का आदिबद्री मंदिर दानपुर की सदियों पुरानी आस्था का केंद्र।

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घनश्याम जोशी, बागेश्वर। बदियाकोट स्थित आदिबद्री मां नंदा भगवती मंदिर में आग लगने से पूरा मंदिर जलकर राख हो गया। पहाड़ के मंदिर में आग लगने की यह पहली घटना बताई जा रही है।
घटना से भक्त स्तब्ध हैं। दानपुर की 14 पट्टी का यह साझा शक्तिपीठ लोकपरंपराओं, सामूहिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। मंदिर की पहचान लोककथाओं, पीढ़ियों से चली आ रही पूजा पद्धतियों और आठ वर्ष में होने वाली आठ्यौं जात से जुड़ी है।
क्षेत्र में प्रचलित मान्यता के अनुसार, चमोली के बंड क्षेत्र के छलि और बलि नाम के दो भाई गढ़वाल में एक मृग का पीछा करते हुए बदियाकोट पहुंचे। छोटी पहाड़ी के पास मां नंदा भगवती ने उन्हें कन्या के रूप में दर्शन दिए।
ये है लोकमान्यता
लोकमान्यता है कि मां ने दोनों भाइयों को उसी स्थान पर मंदिर स्थापित कर सेवा और भक्ति करने का आदेश दिया और फिर अंतर्ध्यान हो गईं। आगे चलकर दोनों भाइयों के छह-छह पुत्र हुए। उनकी संतति बारह बदकोटी के नाम से प्रसिद्ध हुई। स्थानीय परंपराओं में इस वंश का संबंध मां नंदा के विभिन्न शक्तिपीठों की पुजारी व्यवस्था से भी जोड़ा जाता है।
बदियाकोट मंदिर मल्ला और तल्ला दानपुर की धार्मिक परंपराओं में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। स्थानीय मान्यताओं में मां नंदा भगवती के तीन प्रमुख सिद्धपीठ बताए जाते हैं। बदियाकोट का आदिबद्री पीठ, सरयू घाटी का बैछमधार सिद्धपीठ और पोथिंग स्थित मां नंदा सिद्धपीठ।
खाती, वाछम, सोराग, तीख, डौला, किलपारा, कुवारी, कालौ, बोराचक और झारकोट समेत कई गांवों के लोग मंदिर से जुड़े हैं। जोहार-मुनस्यारी, पिंडर घाटी और गढ़वाल से भी श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। पूजा-अर्चना के साथ श्रमदान और सहयोग की परंपरा भी निभाई जाती है।
मंदिर की प्रमुख परंपराओं में आठ्यौं जात का विशेष महत्व है। मान्यता के अनुसार, हर आठ वर्ष में बड़ी आठ्यौं जात और चार वर्ष में घर-आठ्यौं का आयोजन होता है। नंदा अष्टमी के अनुष्ठानों में दूर-दराज से श्रद्धालु शामिल होते हैं।
दानपुर के दाणू देवता विभिन्न क्षेत्रों में जाकर लोगों को आमंत्रित करते हैं। देव-डांगरों के व्रत, नंदा कुंड और सुंदरढूंगा क्षेत्र में पूजा तथा नंदा अष्टमी पर वापसी की परंपराएं इस आयोजन को विशिष्ट बनाती हैं। मां नंदा के साथ लाटू देवता और तिब्बती हूंण देवता की भी पूजा होती है।
स्थानीय विवरणों के अनुसार, मंदिर के भव्य द्वार की देवदार की लकड़ी कौसानी और सफेद पत्थर सोर क्षेत्र से लाया गया। परिसर की पारंपरिक शैली से प्रेरित खोली इसकी शोभा बढ़ाती है। पुराने समय में मंदिर को थौरुप भी कहा जाता था और छत लकड़ी के तख्तों से बनाई जाती थी।
मंदिर भक्त गोविंद दानू और आन सिंह के अनुसार, नवीनीकरण में मल्ला दानपुर के गांवों के लोगों ने श्रमदान और आर्थिक सहयोग दिया। सोराग गांव को मां भगवती का मायका मानने की परंपरा है। स्थानीय मान्यता के मुताबिक, सोराग के ग्रामीणों को छत के लिए धूरा का लट्ठा ले जाने का पारंपरिक अधिकार है।
ब्रिटिश काल में मंदिर को गूंठ दिए जाने और पिंडारी क्षेत्र में पशु चुगान से मिले कर का हिस्सा भेंट किए जाने का भी स्थानीय विवरणों में उल्लेख है। दस्तावेजी प्रमाण मिलने पर मंदिर का सामाजिक और आर्थिक इतिहास अधिक स्पष्ट हो सकता है। जिला मुख्यालय से करीब 58 किमी दूर स्थित यह मंदिर दानपुर की साझा आस्था का केंद्र है।
विधायक कपकोट सुरेश गढ़िया ने कहा कि मंदिर को भारी नुकसान हुआ है। यह दानपुर घाटी की आस्था का केंद्र है। मंदिर सुंदरीकरण आदि के लिए 1.15 करोड़ रुपये स्वीकृत हैं। जल्द ही मंदिर अपनी पुरानी लुक में आएगा।
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