सुरेश पांडेय, बागेश्वर: बागनाथ नगरी में प्रतिवर्ष मकर संक्रांति पर लगने वाले उत्तरायणी मेले का पौराणिक, धार्मिक व व्यावसायिक महत्व के साथ- साथ ऐतिहासिक महत्व भी है। इसी दिन बागेश्वर में अंग्रेजों द्वारा लागू किए गए कुली बेगार प्रथा का अंत हुआ था। आजादी के रणबांकुरों ने ब्रिटिश सरकार की परवाह किए बगैर बेगार प्रथा के रजिस्टर सरयू नदी में प्रवाहित किए थे। जनता के इस आंदोलन से प्रभावित होकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इसे रक्तहीन क्रांति का नाम देकर बागेश्वर में 1929 में बड़ी सभा को संबोधित किया था।

अग्रेजी शासनकाल में उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में बेगार प्रथा का चलन था। नियम के तहत किसी भी ब्रिटिश अधिकारी के भ्रमण के दौरान क्षेत्र के नागरिकों को बारी बारी से कुली बनाया जाता था। गांव के पंचायत प्रतिनिधियों के पास कुली बेगार प्रथा का रजिस्टर होता था। अधिकारियों के सामान को पहाड़ों में ढोने का जिम्मा कुली का ही होता था। ऐसा न करने पर कठोर दंड दिया जाता था। यही नहीं अधिकारी के गांव में भोजन व आवास की व्यवस्था भी ग्रामीणों को ही करनी होती थी। यह गैर कानूनी नियम होने के बाद भी इसका कड़ाई से पालन कराया जाने लगा। इस प्रथा के विरुद्ध आंदोलन की सुगबुगाहट बीसवीं सदी में होने लगी। पहाड़ की जनता ने इस प्रथा को खत्म करने की मांग को लेकर तत्कालीन कमिश्नरों को कई पत्र लिखे जिसे अनसुना कर दिया गया। वर्ष 1910 में पहली बार एक किसान ने इस प्रथा के खिलाफ इलाहाबाद न्यायालय में याचिका दायर की। न्यायालय ने बेगार प्रथा को गैर कानूनी प्रथा करार दिया। लेकिन अंग्रेजी सरकार ने न्यायालय के आदेश को आम जनता तक पहुंचने ही नहीं दिया तथा बेगार प्रथा को जारी रखा। बाद में पहाड़ के प्रबुद्ध जनों ने कुमांऊ परिषद के नाम का संगठन बनाकर लोगों को बेगार प्रथा के खिलाफ जागरूक किया। परिषद में एड. भोलादत्त, पांडे, कुमांऊ केसरी बद्री दत्त पांडे, विक्टर मोहन जोशी, हरगोविंद पंत, रिटायर्ड डिप्टी कलक्टर बद्रीदत्त जोशी, तारा दत्त गैरोला मुख्य भूमिका में थे।

बापू की अपील का हुआ असर

बागेश्वर: कुली उतार आंदोलन की सफलता में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अपील का बड़ा असर हुआ। कुमाऊं परिषद के एक दल ने गांव गांव जाकर लोगों को प्रथा के खिलाफ गोलबंद किया तथा एक दल ने नागपुर जाकर महात्मा गांधी को इसकी जानकारी दी। महात्मा गांधी उस वक्त तो पहाड़ नहीं आए लेकिन उन्होंने पहाड़ के लोगों से अपील की कि वह बेगार प्रथा का विरोध करें तथा किसी भी ब्रिटिश अधिकारी के आवास व भोजन की व्यवस्था न करें। बापू के इसी संदेश को लेकर परिषद के कार्यकर्ता गांव गांव गए।

पुलिस के सामने ही बहाए रजिस्टर

बागेश्वर: प्रथा के विरुद्ध लोगों में फैल रहे आक्रोश को देखते हुए कमिश्नर ने 14 जनवरी 1921 को निषेधाज्ञा लागू कर बड़ी संख्या में पुलिस तैनात कर दी। लेकिन पुलिस की परवाह किए बगैर ही क्षेत्र के प्रधानों, थोकदारों ने एक स्वर में बेगार प्रथा का विरोध करते हुए पुलिस के सामने ही रजिस्टर सरयू नदी में प्रवाहित कर दिए। इस आंदोलन की सूचना देशभर में आग की तरफ फैल गई। आंदोलन से प्रभावित राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इसे रक्तहीन क्रांति का नाम दिया।

राजनैतिक परंपरा आज भी कायम

बागेश्वर: रक्तहीन क्रांति के गवाह रहे सरयू तट पर हर वर्ष मकर संक्रांति पर राजनैतिक दल मंच लगाकर लोगों को संबोधित करते हैं तथा वर्षभर के कार्यक्रमों की घोषणा करते हैं। राजनैतिक दल शक्ति प्रदर्शन भी करते हैं।