रानीखेत, [दीप सिंह बोरा]: हिमानी और गैर हिमानी महानदियों के उद्गम पर शोध कर रहे वैज्ञानिकों ने चमोली के गोपेश्वर में गुमनाम 'देवर' झील को ढूंढ निकाला है। झील की उम्र कार्बन डेटिंग के जरिये सात हजार वर्ष आंकी गई है।

वरिष्ठ भूगर्भ वैज्ञानिक प्रोफेसर बहादुर सिंह कोटलिया के अनुसार टेक्टोनिक फॉल्ट यानी भीषण भूप्रलय में बड़ी पर्वत श्रृंखला के टूटने के बाद उथल-पुथल से यह झील अस्तित्व में आई। सात हजार वर्ष पूर्व के जैविक कार्बन इस बात की तस्दीक कर रहे कि तब देवर झील क्षेत्र के आस-पास वनस्पति भी थी। शोध करने वाले वैज्ञानिक का दावा है कि असंख्य भ्रंशों (थ्रस्ट) की सक्रियता के कारण गढ़वाल का यह पूरा इलाका अतिसंवेदनशील है। जहां कभी भी भूप्रलय के बाद नई झील अस्तित्व में आ सकती है।

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झील के प्रारंभिक शोध में यह भी खुलासा हुआ है कि जलाशय क्षेत्र में कदम रखने वाला पहला व्यक्ति हरियाली (पर्यावरण) के प्रति बेहद सभ्य व संवेदनशील रहा होगा। जिसके प्रयास से झील के आसपास हरियाली उपजी। अब इसी आधार पर हिमालयी प्रांत में तब और अब जलवायु में परिवर्तन, भूगर्भीय हालात आदि पहलुओं पर अनुसंधान शुरू कर दिया गया है। मिनिस्ट्री ऑफ अर्थ साइंस की पहल पर कुमाऊं विश्वविद्यालय के वरिष्ठ भूगर्भ वैज्ञानिक के निर्देशन में जर्मन व चीनी वैज्ञानिकों व शोधार्थियों ने गोपेश्वर (चमोली) में अभी तक गुमनाम देवर झील को खोजा है। हाईटेक कोरिंग मशीन की मदद से झील की तलहटी से एकत्र कठोर चट्टान, गाद व मिट्टी के नमूनों की जांच के बाद इसे सात हजार वर्ष पुराना माना जा रहा है।

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1991 के भूकंप में घटा झील का क्षेत्रफल
देवर झील की खोज में एक और रोचक जानकारी सामने आई है। शोधकर्ता प्रो. कोटलिया के अनुसार कभी यह झील एक किलोमीटर क्षेत्रफल में थी, जो 1991 के भूकंप में सिकुड़ कर महज 350 मीटर रह गई। भूकंप से हुई उथल-पुथल में इस झील के भूजल स्रोत प्रभावित हो गए और झील की लंबाई घट गई। इससे पहले भी प्रो. कोटलिया ने गढ़वाल में ही बदानी झील की खोज की थी। अब नई देवर झील की खोज के बाद गढ़वाल में मध्यम व बड़ी झीलों की संख्या 15 और राज्य में 20 हो गई है।

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देवर झील का पता लगना बड़ी कामयाबी
कुमाऊं विश्वविद्यालय के वरिष्ठ भूगर्भ वैज्ञानिक प्रोफेसर बहादुर सिंह कोटलिया ने बताया कि गढ़वाल में बदानी के बाद देवर झील का पता लगना बड़ी कामयाबी है। इस झील ने उत्तराखंड में भूप्रलय के पुराने इतिहास से भी रूबरू कराया है। झील से हमने कोरिंग मशीन से सतही चट्टान, गाद व मिट्टी आदि के नमूने लिए हैं। इनमें भूकंप से उथल-पुथल के निशान मिले हैं। यही नहीं गढ़वाल का बड़ा इलाका पठारनुमा रहा, जिसे जलाशय क्षेत्र में कदम रखने वाले पहले व्यक्ति ने वनस्पति, कृषि व पशुपालन को बढ़ावा देकर इसे आबाद किया। साक्ष्यों के आधार पर भूकंपीय कलेंडर, हिमालयी क्षेत्र में कृषि, सभ्यता संस्कृति आदि रहस्यों से पर्दा उठाने में मदद मिलेगी।

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Edited By: sunil negi

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