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औषधीय पौधा किलमोड़ा ने जगाई ब्लड कैंसर के प्रभावी उपचार की उम्मीद, ICMR देगा क्लीनिकल ट्रायल की अनुमति

Published: Tue, 18 Aug 2026 06:30 PM (IST)

उत्तराखंड के औषधीय पौधे किलमोड़ा (बरबेरिस एरिस्टाटा) ने रक्त कैंसर के उपचार में नई उम्मीद जगाई है।

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HighLights

  1. किलमोड़ा पौधे से रक्त कैंसर उपचार की उम्मीद जगी।

  2. छाल का अर्क डाक्सोरूबिसिन के साथ प्रभावी पाया गया।

  3. आईसीएमआर अब क्लीनिकल ट्रायल की अनुमति देगा।

संतोष बिष्ट, अल्मोड़ा। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से मिलने वाला औषधीय पौधा किलमोड़ा (बरबेरिस एरिस्टाटा) ने रक्त कैंसर के उपचार की उम्मीद जगाई है।

सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय अल्मोड़ा, कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के संयुक्त शोध के बाद चूहों पर इसका परीक्षण सफल रहा है।

इसमें सामने आया है कि किलमोड़ा की छाल का अर्क यदि कैंसर की कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाली दवा डाक्सोरूबिसिन के साथ दिया जाए तो उपचार अत्यधिक प्रभावी हो सकता है। अब विज्ञानी इस दवा को क्लीनिकल ट्रायल के लिए इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च सेंटर (आई सीएमआर) को भेजने की तैयारी में हैं।

शोधार्थियों और विज्ञानियों की ओर से अल्मोड़ा व रानीखेत से किलमोड़ा (दारुहल्दी या किंगोड़ा) के पौधे चयनित कर उनकी छाल से तैयार अर्क का रासायनिक विश्लेषण किया गया। इसके बाद प्रयोगशाला में कैंसर कोशिकाओं पर एमटीटी असे, फ्लोरोसेंस माइक्रोस्कोपी, फ्लोसाइटोमेट्री और वेस्टर्न ब्लाटिंग जैसी आधुनिक तकनीकों से परीक्षण किया गया।

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शोध के दौरान नैनीताल व बीएचयू की लैब में चूहों पर किए गए प्रयोगों में सामने आया कि किलमोड़ा की छाल के अर्क और डाक्सोरूबिसिन के संयोजन से रक्त कैंसर की कोशिकाओं की वृद्धि प्रभावी रूप से नियंत्रित हुई। साथ ही कीमोथेरेपी से होने वाले सामान्य दुष्प्रभावों में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई।

डाक्सोरूबिसिन एक प्रभावी कीमोथेरेपी दवा है, जो कैंसर कोशिकाओं के डीएनए व टोपोआईसोमेरेज-2 एंजाइम को बाधित करती है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह परिणाम भविष्य में अधिक सुरक्षित और प्रभावी संयोजन चिकित्सा विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

उत्तराखंड के औषधीय पौधों के वैज्ञानिक महत्व को भी मिलेगी नई पहचान

मुख्यमंत्री शोध प्रोत्साहन योजना के तहत वर्ष 2024 से किलमोड़ा पर विज्ञानियों और शोधार्थियों ने दो साल तक कड़ी मेहनत की। इसके बाद उनको सफलता मिली। विज्ञानियों का कहना है कि यह अध्ययन रैट माडल पर आधारित है। अब अगले चरण में इंसान पर परीक्षण होगा।

यदि यह भी सफल रहता है तो किलमोड़ा आधारित दवा रक्त कैंसर के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यह उत्तराखंड के औषधीय पौधों के वैज्ञानिक महत्व को भी नई पहचान देगा।

इस शोध में मुख्य अन्वेषक जंतु विज्ञान विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. मुकेश सामंत,सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय के सुमित सिंह, डा.रंजीत मनहास और डॉ. विनिता गौरी के अलावा बीएचयू के डा.बिप्लव और पूजा गोस्वामी शामिल रहे।

विभिन्न प्रकार के कैंसर के उपचार की दिशा में देश-दुनिया में शोध हो रहे हैं। जुलाई 2026 तक चले हमारे शोध में किलमोड़ा की छाल के अर्क और डाक्सोरूबिसिन के संयोजन से रक्त कैंसर की कोशिकाओं की वृद्धि प्रभावी रूप से नियंत्रित होना बड़ी सफलता है। चूहों पर ट्रायल के बाद अब दवा को क्लीनिकल ट्रायल के लिए आईसीएमआर को भेजा जाएगा।

-डॉ. मुकेश सामंत, मुख्य अन्वेषक,शोध