संवाद सहयोगी, द्वाराहाट : उत्तराखंड विज्ञान एवं शिक्षा अनुसंधान केंद्र देहरादून (यूसर्क) के तत्वावधान में विकासखंड के दुर्गम गाव बड़ेत में गैरहिमानी नदी गगास व खिरो के घटते जलस्तर पर चिंता जताई गई। वक्ताओं ने नदियों को बचाने के लिए उद्गम क्षेत्र में अधिकतम पौंध लगाने तथा वनों को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास पर जोर दिया।

बड़ेत गांव में यूसर्क व नौला फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में महिला सशक्तीकरण आधारित सामाजिक सहभागिता ग्रामीण जन जागरूकता कार्यशाला में वक्ताओं ने इसके लिए वनों का अवैज्ञानिक दोहन पर चिंता जताई। ललित मोहन बिष्ट ने कहा कि नदियों को बचाने के लिए मिस्त्रित वन क्षेत्रों के संरक्षण को ठोस प्रयास करने होंगे। उत्तराखंड विज्ञान एवं शिक्षा अनुसंधान केंद्र के पर्यावरणविद् मनोहर सिंह मनराल ने कहा कि जंगलों के कटने का असर वर्षा और बर्फबारी पर पड़ा है। गैर हिमानी नदियां रोखड़ व नालों में तब्दील हो गई हैं। उन्होंने गगास व खिरो नदी की सहायक नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए चाल, खाल और गढ्डे बनाए बना सहायतित प्राकृतिक पुनरोत्पादन पद्धति से जंगलों का संरक्षण और संवर्द्धन पर जोर दिया। अध्यक्षता ग्राम प्रधान रेखा बिष्ट ने की। कार्यशाला को संदीप कत्यूरी मनराल, वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. गिरीश नेगी, डॉ. नवीन चंद्र जोशी, किसन भट्ट, गणेश कठायत, कमल पाडे आदि ने पारंपरिक नौलों के संवर्धन की आवश्यकता तथा भविष्य की चुनौतियों के बारे में जानकारी दी।

Posted By: Jagran

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