संवाद सहयोगी, अल्मोड़ा :

जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण शोध एवं सतत विकास संस्थान कोसी कटारमल में 'अंतरराष्ट्रीय पर्वत दिवस' सम्मेलन के दूसरे दिन हिमालयी कृषि पर बदलते जलवायु के पड़ते प्रभावों पर चिंतन किया गया।

वैज्ञानिकों ने मंगलवार को वैश्विक तापवृद्धि जनित जलवायु परिवर्तन से हिमालयी क्षेत्र में 'फ्लोरा व फॉना' पर गहराते संकट पर चिंता जताई। उन्होंने अवैज्ञानिक दोहन व शिकार पर कारगर अंकुश लगा इनके संरक्षण के लिए ठोस नीति बनाने पर जोर दिया। देश में फ्लोरा की 19600 प्रजातियों में से फंगस, एलगी, लाइकेंस समेत करीब 113 अति संकटग्रस्त श्रेणी में रखी गई है। वहीं फॉना से जुड़ी भराल, हिम तेंदुआ, कस्तूरी मृग समेत 133 विविध जीव खतरे में हैं।

मंगलवार को विभिन्न चरणों में हुए जलवायु परिवर्तन से हिमालयी क्षेत्र, कृषि, फ्लोरा व फॉना, मत्स्य पर पड़ रहे प्रभाव व इससे बचने की राह ढूंढ़ी गई। वैज्ञानिकों ने कहा, 2300 से 2400 किमी तक कश्मीर से अरुणाचल तक फैले हिमालय में पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़े फ्लोरा व फॉना बेहद दयनीय दौर से गुजर रहे हैं। इसके लिए वनों के अंधाधुंध दोहन, कृषि क्षेत्र में कंक्रीट के तैयार होते जंगलात को बड़ा कारक बताया गया।

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कस्तूरी मृग पर नए सिरे से शोध

वैज्ञानिकों ने कहा कि ग्लोबल वार्मिग से कस्तूरी हिरण पर खतरा मंडरा रहा है। अवैध शिकार ने भी इसका वजूद संकट में डाल दिया है। डॉल्फिन इंस्टीट्यूट देहरादून

के निदेशक प्रो.अरुण कुमार ने कहा कि करीब दो हजार मीटर से ऊपर पाए जाने वाले कस्तूरी हिरण पर नए सिरे से शोध होगा। भराल की जनसंख्या कम होना भी चिंतनीय है।

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कीड़ा जड़ी संग्रहण की बने नीति

वैज्ञानिकों ने उच्च हिमालयी क्षेत्रों में औषधीय वनस्पतियों कुटकी, जटामासी के अवैध दोहन पर भी चिंता जताई। शोध अध्ययन का हवाला दिया कि अवैज्ञानिक दोहन कर बहुमूल्य वनस्पतियां तस्करी कर सीधे बाहरी देशों तक पहुंचाई जा रहीं हैं। काली व गोरी गंगा के बीच कस्तूरी मृग के अवैध शिकार का खुलासा करते हुए वैज्ञानिकों ने कीड़ा जड़ी संग्रहण के लिए कारगर नीति पर बाल दिया।

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वर्जन

वन व कृषि क्षेत्र घटेंगे। अनियोजित विकास होगा तो ग्लोबल वार्मिंग का स्तर भी बढ़ेगा। इससे नेचुरल फॉना प्रभावित हो रहा। तेंदुआ, बाघ, कस्तूरी हिरण पलायन कर रहे हैं। ऐसा ही रहा तो उच्च हिमालय में भी रहने लायक आबोहवा नहीं मिलेगी। इससे ये प्रजातियां लुप्त हो जाएंगी।

- प्रो. अरुण कुमार, निदेशक डॉल्फिन इंस्टीट्यूट देहरादून'

Posted By: Jagran

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