विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

विश्व थ्राम्बोसिस दिवस : गर्भावस्था में थक्का बनने का खतरा, समय पर इलाज से बच सकती है मां-शिशु की जान

By Shivam SinghEdited By: Abhishek sharma
Published: Tue, 13 Oct 2026 04:46 AM (IST)

विश्व थ्रोम्बोसिस दिवस पर वाराणसी के विशेषज्ञों ने गर्भावस्था में रक्त के थक्के बनने के खतरे और समय पर उपचार ...और पढ़ें

गर्भावस्था में रक्त के थक्के: समय पर उपचार से मां-शिशु की जान बचाना संभव।

गर्भावस्था में रक्त के थक्के: समय पर उपचार से मां-शिशु की जान बचाना संभव।

HighLights

  1. गर्भावस्था में रक्त के थक्के का खतरा पांच गुना अधिक।

  2. 'गोल्डन आवर' में उपचार से स्थायी नुकसान से बचाव।

  3. समय पर इलाज से मां और शिशु की जान बचती है।

शिवम सिंह, जागरण, वाराणसी। शरीर में खून का थक्का बिना किसी स्पष्ट चेतावनी के बन सकता है। यह हृदय, मस्तिष्क या गर्भस्थ शिशु तक रक्त पहुंचाने वाली आपूर्ति रोक सकता है। एमसीएच विंग बीएचयू के शोधकर्ताओं के अनुसार, ‘गोल्डन आवर’ में सही उपचार मिलने पर मरीज की जान बचाने के साथ गर्भावस्था के गंभीर परिणामों को भी सुधारा जा सकता है।

विश्व थ्रोम्बोसिस दिवस हर साल 13 अक्टूबर को मनाया जाता है। यह दिन रक्त वाहिकाओं (नसों या धमनियों) में खतरनाक रक्त का थक्का जमने (थ्रोम्बोसिस) के प्रति वैश्विक जागरूकता बढ़ाने के लिए समर्पित है।

राजातालब की 28 वर्षीय गर्भवती महिला अनीता शर्मा के बाएं पैर में 28वें सप्ताह में थक्का बन गया। दर्द और सूजन के बाद उन्होंने तुरंत बीएचयू के चिकित्सक से संपर्क किया। डोपलर जांच में डीवीटी की पुष्टि हुई। लो मालिक्यूलर वेट हेपरिन का इलाज शुरू किया गया। नियमित निगरानी से थक्का नियंत्रित रहा। 39वें सप्ताह में स्वस्थ शिशु का जन्म हुआ।

डाक्टरों का कहना है कि समय पर इलाज से पल्मोनरी एम्बोलिज्म का खतरा टल गया। गर्भावस्था में ऐसे लक्षण नजरअंदाज न करें। इसी तरह शहर की 34 वर्षीय गर्भवती सुनीता देवी के पैर में दर्द को सामान्य समझकर चार दिन नजरअंदाज किया।

पांचवें दिन सांस फूलने और सीने में दर्द के बाद सर सुंदरलाल अस्पताल पहुंचीं। जांच में डीवीटी और पल्मोनरी एम्बोलिज्म मिला। आईसीयू में भर्ती कर हेपरिन से इलाज किया गया। मां की जान तो बच गई, लेकिन 35वें सप्ताह में सिजेरियन से बच्चे का जन्म हुआ। चिकित्सकों ने कहा कि लक्षणों को हल्के में लेने से स्थिति गंभीर हो गई। गर्भावस्था में थक्के का खतरा पांच गुना अधिक होता है।

थ्रोम्बोलिटिक थेरेपी मिलने से स्थायी नुकसान से हो सकता बचाव

श्री शिव प्रसाद गुप्त मंडलीय जिला चिकित्सालय के प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक डा. बृजेश कुमार ने बताया कि जनवरी 2026 से 10 अक्टूबर तक अस्पताल में 10,714 सीटी स्कैन किए गए। इनमें 10 मरीजों में ब्रेन इंफार्क्शन, थ्रोम्बोसिस और रक्त आपूर्ति कम होने (इस्केमिया) की पुष्टि हुई। उन्होंने कहा कि थ्रोम्बोसिस साधारण बीमारी नहीं है।

हृदय की धमनियों में थक्का हार्ट अटैक, मस्तिष्क की धमनियों में स्ट्रोक और हाथ-पैर की धमनियों में गैंग्रीन का कारण बन सकता है। घटना के बाद शुरुआती एक-दो घंटे ‘गोल्डन आवर’ होते हैं। इस दौरान थ्रोम्बोलिटिक थेरेपी मिलने से स्थायी नुकसान से बचा जा सकता है। अस्पताल के आपातकालीन विभाग में कार्डियोवैस्कुलर और स्ट्रोक के मरीजों के लिए 24 घंटे विशेषज्ञ और जीवनरक्षक दवाएं उपलब्ध हैं। लक्षण दिखने पर घरेलू नुस्खों या झोलाछाप के चक्कर में समय गंवाने से बचना चाहिए।

इस कारण महिलाओं में हो रही समस्या

बीएचयू के हिमेटोलाजी मेडिसिन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो वर्षों में थ्रोम्बोसिस के 78 मरीज आए, जिनमें 80 प्रतिशत पूरी तरह स्वस्थ होकर घर लौटे। यह समस्या महिलाओं में अधिक पाई गई। गर्भनिरोधक गोलियां लेने वाली, गर्भावस्था के दौरान या बाद में रहने वाली, लंबे समय तक बिस्तर पर आराम करने वाली, मोटापे से ग्रस्त और धूम्रपान करने वाली महिलाओं में जोखिम बढ़ जाता है।

इसी खतरे पर बीएचयू के विशेषज्ञों ने शोध किया। इंटरनेशनल जर्नल आफ रिप्रोडक्शन, कान्ट्रासेप्शन, आब्स्टेट्रिक्स एंड गायनेकोलाजी में मार्च 2017 में प्रकाशित अध्ययन ‘इफिकेसी आफ एंटी-थ्राम्बोटिक ट्रीटमेंट इन थ्राम्बोफिलिया पेशेंट्स विद एडवर्स प्रेग्नेंसी आउटकम’ में 54 गर्भवती महिलाओं को शामिल किया गया।

उनकी पिछली या मौजूदा गर्भावस्था में बार-बार गर्भपात, शिशु की वृद्धि रुकने, प्लेसेंटा समय से पहले अलग होने या अन्य जटिलताओं का जिक्र था। थ्रोम्बोफिलिया यानी असामान्य रूप से थक्का बनने की प्रवृत्ति की पुष्टि के बाद महिलाओं को कम आणविक भार वाले हेपरिन या अनफ्रैक्शनेटेड हेपरिन के साथ एस्पिरिन दी गई। उन्हें फोलिक एसिड भी दिया गया।

उपचार लेने वाली महिलाओं और नवजातों में रक्तस्राव संबंधी कोई गंभीर जटिलता नहीं हुई। पहली तिमाही से उपचार शुरू करने वाली महिलाओं के शिशुओं का जन्म-वजन तुलनात्मक रूप से बेहतर पाया गया। यह शोध डा. अनिल कुमार अधिकारी, बीएचयू के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की प्रो. मधु जैन और पैथालाजी विभाग की डा. ज्योति शुक्ला ने किया।

लक्षण और बचाव

पैर में अचानक सूजन, दर्द या भारीपन, त्वचा का लाल या नीला पड़ना, अचानक सांस फूलना और सीने में दर्द थक्का बनने के खतरे के संकेत हो सकते हैं। इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें। लंबे समय तक एक जगह न बैठें, पर्याप्त पानी पिएं और नियमित टहलें। धूम्रपान और शराब से दूर रहें तथा ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्राल नियंत्रित रखें। जागरूकता और समय पर इलाज से इस खतरे पर काबू पाया जा सकता है।

cmo

वाराणसी में हृदय संबंधी आपात स्थितियों के उपचार के लिए प्रदेश में पहली बार स्टेमी केयर प्रोजेक्टर की शुरुआत हुई। अब तक 300 से अधिक लोगों का खून पतला (थ्रंबोलाइज) कर जान बचाई जी चुकी है। स्टेमी केयर नेटवर्क से हार्ट अटैक के मरीजों को जान बचाने के प्रयास के अच्छे रिजल्ट मिल रहे हैं।

-

डा. एनपी सिंह, सीएमओ वाराणसी।