सोनभद्र [सुजीत शुक्ल]। बात कक्षा पांच की है जब आरा मशीन में हाथ फंस गए और अंतत: दोनों को काटने पड़े। पहाड़ सी बची जिंदगी में अचानक हादसे की इस घटना से उबर पाना मुश्किल था लेकिन, धीरे-धीरे कटे हाथ ही सफलता के आयाम गढऩे लगें। परिणाम यह हुआ कि हाईस्कूल से इंटरमीडिएट और फिर बीएड करके आदित्य बिड़ला इंटर कालेज में प्रवक्ता बन गए। ये बातें किसी और की नहीं बल्कि शशांक शेखर त्रिपाठी की है। इन्होंने मात्र 39 साल की अवस्था में अनेकों उतार-चढ़ाव देखे जिसमें हर संघर्ष के बाद झोली में सफलताएं ही प्राप्त हुईं। 

चतरा ब्लाक के अहेई पश्चिम पट्टी यानी शिवाला गांव निवासी शशांक शेखर त्रिपाठी तब नौ साल के थे जब घर के पास ही खलिहान में चारा मशीन में हाथ फंसे थे। घर के अन्य सदस्य मौजूद थे। घटना को देख सभी सन्न रह गए। चिकित्सक के पास लेकर पहुंचे। लेकिन हाथ ठीक होने के बजाय कोहनी तक काटने पड़े। शशांक उस समय कक्षा पांचवीं में थे।

शेष हाथों से बाजी मार पेश की मिसाल

शशांक बताते हैं कि उसके बाद हमनें पैर से लिखने की कोशिश की लेकिन, अक्षर काफी बड़े-बड़े बनते थे। अभ्यास में एक साल निकल गया। इस तरह से एक साल पढ़ाई नहीं कर सका। अगले साल फिर से पांचवीं में प्रवेश लिया। अब कटे हाथ के बीच कलम फंसाकर लिखने की कोशिश की जिसमें सफल रहा। बताते हैं कि अभ्यास करते-करते करीब एक हजार पन्ने लिख डाले। तब जाकर लिखावट में दम आया। अब उन्हीं हाथों बदौलत आज इस मुकाम पर हैं। शशांक अपनी पत्नी संध्या व दो बच्चों के साथ खुशहाल ङ्क्षजदगी जी रहे हैं।

जीत के लिए दिव्यांगता आड़े नहीं

हार-जीत शरीर के सुंदर होने से नहीं बल्कि उसमें बैठे हौसले से प्राप्त की जाती है। विपरीत परिस्थितियां जिस किसी के लिए अनुकूल लगें सफलताएं उसी का कदम चूमती हैं। सोनांचल में ऐसे दिव्यांग हैं जिन्होंने दिव्यांग श्रेणी के क्रिकेट में अंतराष्ट्रीय ख्याति अर्जित की है। इसमें अनपरा के लव वर्मा का नाम किसी से छिपा नहीं है। दुद्धी क्षेत्र की सुमन जायसवाल चलने-फिरने लायक नहीं है। बावजूद कढ़ाई, बुनाई, पेंङ्क्षटग में महिलाओं, किशोरियों को प्रशिक्षण दे रही हैं। वहीं बभनी के चकबदरीसानी के आशीष व सरिता जन्मांध होने के बावजूद पढ़ाई में अव्वल हैं।

 

Posted By: Saurabh Chakravarty

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