मानव उत्पत्ति के रहस्यों से उठेगा पर्दा, बीएचयू और आस्ट्रेलिया मिलकर करेंगे शोध
काशी हिंदू विश्वविद्यालय और ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी मानव उत्पत्ति व विकास के रहस्यों को समझने के लिए संयुक्त शोध ...और पढ़ें

जनवरी 2027 से होगी शुरुआत, सात साल में खर्च होंगे 85 मिलियन डालर।
HighLights
बीएचयू और ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी करेंगे मानव उत्पत्ति पर शोध।
जनवरी 2027 से शुरू होगा अंतरराष्ट्रीय शोध परियोजना का कार्य।
मानव विकास के पूर्वाग्रहों को दूर करने पर जोर दिया जाएगा।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। मानव उत्पत्ति और विकास के रहस्यों को समझने के लिए काशी हिंदू विश्वविद्यालय और ऑस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी मिलकर शोध करेंगे। इसके लिए दोनों विश्वविद्यालयों के बीच समझौते पर हस्ताक्षर हो चुके हैं। 22 अक्टूबर को हुए इस समझौते के साथ ही अंतरराष्ट्रीय शोध परियोजना के क्रियान्वयन का रास्ता साफ हो गया है।
जनवरी 2027 से शोध कार्य शुरू होने की उम्मीद है। इसमें मानव विकास के अध्ययन में अब तक रहे पूर्वाग्रहों को दूर करने और नए वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने पर जोर दिया जाएगा। बीएचयू के कुलसचिव राजन श्रीवास्तव और ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी की रिसर्च सर्विसेज की डिप्टी डायरेक्टर लिनेटफरकुहर ने ई-हस्ताक्षर के माध्यम से पार्टनर आर्गनाइजेशन एग्रीमेंट की प्रक्रिया पूरी की।
परियोजना के तहत ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के प्रो. माइकल पेट्राग्लिया के नेतृत्व में संचालित 'एआरसी सेंटर आफ एक्सीलेंस फार ट्रांसफार्मिंग ह्यूमन ओरिजिन्स रिसर्च' में बीएचयू की सक्रिय भागीदारी होगी। बीएचयू के जंतु विज्ञान विभाग के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे को केंद्र में पार्टनर इन्वेस्टिगेटर बनाया गया है। वह वैश्विक दक्षिण से जुड़े आंकड़ों के संकलन, विश्लेषण और वैज्ञानिक व्याख्या में योगदान देंगे।
प्रो. चौबे के अनुसार, शुरुआती चरण में जंतु विज्ञान विभाग और प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व (एआइएचसी एंड आर्कियोलाजी) के शोधकर्ता परियोजना से जुड़ेंगे। आगे दूसरे विभागों को भी शामिल किया जाएगा। शोध के निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित किए जाएंगे।
इस केंद्र को आस्ट्रेलियन रिसर्च काउंसिल से सात वर्षों के लिए 85 मिलियन डालर का अनुदान मिला है। परियोजना में आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी, मोनाश यूनिवर्सिटी, यूनिवर्सिटी आफ क्वींसलैंड और यूनिवर्सिटी आफ वेस्टर्न आस्ट्रेलिया सहित कई संस्थान भागीदार हैं।
शोध के लिए नैतिक मानकों पर आधारित साझा डेटा रिपाजिटरी बनाई जाएगी। इसमें स्वदेशी समुदायों के आंकड़ों के प्रबंधन और स्वामित्व के अधिकार संबंधित मूल समुदायों के पास सुरक्षित रहेंगे। परियोजना से विकसित बौद्धिक संपदा का उपयोग साझेदार संस्थान शिक्षा, शिक्षण और आगे के शोध के लिए विश्वव्यापी, रायल्टी-मुक्त लाइसेंस के तहत कर सकेंगे। इस सहयोग से बीएचयू में अंतरविषयक शोध और वैज्ञानिक ज्ञान के प्रसार को भी गति मिलने की उम्मीद है।
