वाराणसी में जुगाड़ू दारोगा, आइपीएस पर भारी, खाकी ही दे रही खाकी को चुनौती
वाराणसी में एक दारोगा, आइपीएस अधिकारी से ज़्यादा प्रभावशाली बन गया है। यह स्थिति पुलिस विभाग के अंदर की चुनौतियों को दर्शाती है, जहाँ खाकी ही खाकी को ...और पढ़ें

पढ़ें दैनिक जागरण का साप्ताहिक कालम वर्दी वाला।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। वर्दी वाला ही इस बार वर्दी वाले के लिए चुनौती बन गया। आइपीएस पर भारी दारोगा को लेकर महकमे में काफी चर्चा का माहौल बना हुआ है। पढ़ें इस सप्ताह राकेश श्रीवास्तव का दैनिक जागरण का वर्दी वाला कालम।
सबका साथ नहीं,बिरादरीवाद पर जोर
‘सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास’ की गाड़ी देश के अधिकांश राज्यों में सफलता के झंडे फहराते हुए आगे बढ़ रही है। इसके बावजूद पुलिस कमिश्नरेट में एक आइपीएस साहब बिरादरीवाद की गाड़ी चला रहे। यह कहने में गुरेज नहीं कि एक जुबां से पुलिसकर्मी अपने साहब की ईमानदारी का गुणगान करते हैं, लेकिन उनके जाति प्रेम से ईमानदार पुलिसकर्मियों में पनप रही कुंठा समूची व्यवस्था को नुकसान पहुंचा रही।
साहब जिन्हें अपना समझते हैं,उन्हें मलाईदार कुर्सी सौंप रहे। उन्हीं का बड़बोलापन साहब के लिए भविष्य में रोड़े अटकाएगा क्योंकि इक्कीसवीं सदी में व्यवस्था तेज गति से बदल रही। बदलाव के इस दौर में निजी कंपनियों की तरह सरकारें भी बेहतर करने की होड़ में शामिल हैं। शीर्ष पर बने रहने को नए-नए प्रयोग किए जा रहे, जिसमें चमकने वाला ही असली हीरा होगा। साहब को भी चमकते हीरे की पहचान करनी होगी, जो उनके भविष्य की राह में उजाला कर सके।
जुगाड़ू दारोगा, आइपीएस पर भारी
जुगाड़ू दारोगाओं के सामने आइपीएस भी मात खा जा रहे हैं। मलाईदार कुर्सी के लिए दारोगा ऐसे-ऐसे रूप दिखा रहे कि साहब उन्हें ही अपना समझ बैठ रहे हैं। ऐसे तीन दारोगा इन दिनों सुर्खियों में हैं। एक जोन में गाड़ी बेपटरी हुई तो दूसरे जोन में दौड़ा दी। सेटिंग में माहिर एक दारोगा काशी जोन की हाईवे स्थित चौकी से हटा तो वरुणा जोन में हाईवे पर नजर आया। इसी तरह वरुणा जोन में हाईवे की चौकी से हटा तो गोमती जोन में जा पहुंचा।
कुर्सी हथियाने के खेल में एक मैडम को भी महारत हासिल है। मंत्री की शिकायत पर काशी से हटीं तो वरुणा जोन में जमीन तैयार कर ली। इस सफलता के पीछे दारोगाओं का जुगाड़ व कालनेमि चेहरा अहम है, जिसे आइपीएस भी नहीं समझ पाते और मलाईदार कुर्सी पकड़ा बैठते हैं। पब्लिक इसे आइपीएस अधिकारियों के अपने-अपने गणित के रूप में देखती है, क्योंकि उसे सब पता होता है। असली सच्चाई तो ऊपर वाला ही जानता होगा।
नाकामी भी अपने नाम लिखो साहब
बचपन में रामलीला के मंच पर एंटरटेनमेंट के लिए कलाकार कुछ हंसने-हसाने का प्रहसन दिखाते थे। परिवार में बंटवारे के प्रहसन में दिखाया जाता था कि मां की पेंशन कौन लेगा तो मैं, फिर उसे रखेगा कौन तो तुम्हारी बारी। गाय का दूध कौन लेगा तो मैं,लेकिन इसकी सेवा कौन करेगा तो तुम्हारी बारी। ये बातें तो हंसी ठिठोली थी, लेकिन पुलिस विभाग में दारोगा-इंस्पेक्टर की बातों में यही झलक रहा है।
ज्यादा दिन नहीं हुए, जब बिल्डर के शूटरों की गिरफ्तारी नहीं करने पर एक थानेदार की कुर्सी छिन गई। इससे पूर्व भेलूपुर में एक इंस्पेक्टर की कुर्सी छिन गई थी। जबकि लूट और मर्डर का राजफाश हुआ तो साहब लोगों ने खूब फोटो खिंचाई। महिमा मंडन में बड़ी-बड़ी बातें कहीं। अब जब फिर से बड़के साहब की समीक्षा का समय आ रहा तो दारोगा-इंस्पेक्टर डरे हुए हैं। बातचीत में उनकी जुबां से एक ही बोल फूटता है कि नाकामी भी अपने नाम लिखो साहब।
साहबों की भीड़,काम से ज्यादा समीक्षा
अभी हाल में हमने आपको बताया था कि एक आइपीएस का ओआर (अर्दली रूम) शाम में होने के कारण पुलिसकर्मी परेशान थे। इसका अब समाधान हो गया है,लेकिन अब एक नई समस्या समीक्षा की आ खड़ी हुई है। पुलिस कमिश्नरेट में इन दिनों 11 आइपीएस अधिकारी हैं, इसलिए सबकी बड़के साहब के सामने अपनी-अपनी जिम्मेदारियों के प्रति जवाबदेही बनती है। इसलिए एक-एक अधिकारी अपनी फाइल दुरुस्त करने के लिए समीक्षा करते हैं। महीने के अधिकांश दिन तैयारियां और जवाब देने में निकल जाते हैं।
ऐसे में काम से ज्यादा समय समीक्षा में ही निकल जा रहा। बड़के साहब अच्छी-अच्छी योजनाएं जरूर लेकर आते हैं, लेकिन उनका कंप्लायंस न होने से सब बेकार। रही-सही कसर धर्म-अध्यात्म की नगरी में वीआइपी मूवमेंट से पूरी हो जाती है। टीम अच्छी है, रिजल्ट अच्छा दे सकती है, योजनाएं अच्छी चलाई जा रही, लेकिन अच्छे परिणाम के लिए समय तो चाहिए भाई क्योंकि वर्दी पहनकर कोई रोबोट तो बन नहीं पाएगा।

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