वाराणसी [कुमार अजय]। घुमक्कड़ी तबीयत के मालिक कलम बुलंद शायर मिर्जा गालिब ने अपने दौर में पूरे मुल्क का दौरा किया। जहां गए वहां की खूबसूरती को अपनी कलम से सुनहरे लफ्ज दिए। इन्हीं गालिब ने जब बनारस के मुख्तसर से ठहराव में इस शहर की दुनियावी व रुहानी खूबसूरती से पहचान की तो पहली ही नजर में इस नायाब शहर के हुस्न पर निसार हो गए। शहर की रौनकों का अक्स अपनी बंद आंखों में बसाया और दोनों हाथ उठाकर ऊपर वालों से मांगी दुआ-तआल-अल्लाह-बनारस चश्म-ए-बद दूर!

बिहिश्त-ए-खुर्रम-ओ-फिरदौस-ए-मामूर यानी ऐ अल्ला ताला यह शहर बनारस एक हरा-भरा सुंदर स्वर्ग है। इसे बदनजर से बचाए रखना। इस पुरहुस्न शहर की रौनकों पर फिदा गालिब यह कहने से भी नहीं चूके कि -बनारस रा मगर दीदस्त दर ख्वाब 

कि मी-गदर्द नह रश दर्द दहन आब यानी शायर का मतलब यह कि शायद दिल्ली ने बनारस को ख्वाब में देख लिया है। इसलिए उसके मुंह में पानी भर आया है। गंगा की लहरों की रवानी को अपनी धड़कनों से महसूस करते मिर्जा लिखते हैं- हसूदश गुफ्तन आईन-ए- अदब नेस्त 

वलेकिन गबत: गर बाशद अजब नेस्त  दिल्ली को चुनौती देते गालिब कहते है कि यह कहना गलत न होगा कि दिल्ली को बनारस से ईष्या है। हां अगर दिल्ली को बनारस जैसा बनने की तमन्ना है तो इसमें अचरज की भला क्या बात है। 

यह तो हुई बनारस के दुनियावी हुस्न की बात। मंदिरों के घंटों व अजानों की आवाज के बीच गंगाघाट पर बैठे गालिब जब बनारस की गहराई में और उतरते हैं तो शहर की रुहानी खुसूसियत उनके लफ्जों में कुछ इस तरह आती है- कि हर कस कांदरो गुलशन ब-मीरद 

दिगर पेवंद-ए-जिस्माने गीरद 

शायर की कलम बोल उठती है जो व्यक्ति इस शहर में मरता है। वह दोबारा जन्म नहीं लेता। उसकी आशाएं फलती-फूलती है और वह मर कर भी अमर हो जाता है। बनारस के खूबसूरती पर दिलो जान से कुर्बान गालिब को यहां कि दुश्वारियां भी इस कदर भाती हैं कि वह अपने जज्बातों को रोक नहीं पाते और लिखते हैं- खस-ओ-खारश गुलिस्तानस्त गोई 

गुबारश जौहर-ए-जानस्तगोई 

अर्थात बनारस के कांटे व घास भी फूल के समान है और यहां के धूल में भी आत्मा का सार है। 

मगर गोई बनारस शाहिदे हस्ते 

ज गंगश सुबह-ओ-शाम आईन: दर दस्त 

अर्थात अपने छोटे से प्रवास में गालिब को यह लगता है कि बनारस उस प्रेमिका की तरह है जो दिन-रात गंगा का आइना हाथों में लिए अपने ही हुस्न को निहारती रहती है।

बं-गंगश अक्श ता परतौ फिगन शुद 

बनारस खुद नजीर-ए-खेशतन शुद

बनारस तो बनारस गंगा का कलकल बहता पानी और उसकी खामोश लहरों की रवानी जब मिर्जा के दिल में उतरी तो वह यह कहने से नहीं चूके कि बनारस जब भी गंगा में अपनी परछाई निहारता है। खुद ही दीवाना हो जाता है। 

बनारस की कहानी गंगा के बहते पानी व यहां की अलमस्त जिंदगी की रवानी को दिल से महसूसते हुए शायर मिर्जा गालिब में 69 शेरों का गुलदस्ता चराग-ए-दैर की शक्ल में बनारस की रौनकों के नाम भेंट किया। गालिब अब नहीं रहे लेकिन बनारस को लेकर उनके दिल में जो तरंगें तब उठी थी। वे उनके ही शब्दों में आज भी जिंदा है और शिव के त्रिशूल पर बसी इस नगरी की अतीत की कहानी को अपने पन्नों में जस के तस सहेजे हुए हैं। 

 

Posted By: Abhishek Sharma

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