काशी में उतर रहे बाढ़ के पानी में चप्पुओं की चर्र-चर्र के बीच लौट रही जिंदगानी, फिर भी मोहल्लों में लग रहे नाव के 60 फेरे
वाराणसी के नक्की घाट में बाढ़ का पानी उतरने के बावजूद, दैनिक जीवन चुनौतीपूर्ण बना हुआ है, जहाँ नावें आवश्यक ...और पढ़ें

वाराणसी बाढ़: नक्की घाट में घटते पानी के बीच नावों पर निर्भर जनजीवन।
HighLights
नावें नक्की घाट में जीवनरेखा बनी हुई हैं।
लोग रोजमर्रा की जरूरतों के लिए नावों पर निर्भर।
नाविकों को पत्थरबाजी का सामना, सुरक्षा की मांग।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। शाम के करीब पांच बज रहे हैं। वरुणा पुल के नक्की घाट क्षेत्र में पानी कुछ उतर चुका है, लेकिन बाढ़ की मुश्किलें जस की तस हैं। घरों की खिड़कियों से लोग बाहर झांक रहे हैं। नजरें पानी पर टिकी हैं और कान नाविक की आवाज तलाश रहे हैं। तभी दूर से चप्पुओं की चर्र-चर्र सुनाई देती है। खिड़की पर खड़ा एक व्यक्ति हाथ हिलाता है। दूसरे घर से आवाज आती है, अरे भैया... किसी को ले लीजिए, पहुंचा दीजिए।
नाविक हुंकारी भरता है। कभी हां, कभी ना। नाव एक घर के पास रुकती है और फिर अगले घर की ओर बढ़ जाती है। किसी को बीमार हालत में बाहर निकालना है तो कोई आटा, चावल, दाल, सब्जी, दूध, दवा और घर-गृहस्थी का सामान लेकर लौट रहा है। किसी के हाथ में पानी का डिब्बा है तो कोई जरूरी सामान की थैली संभाल रहा है। बाढ़ के बीच नाव यहां सिर्फ नाव नहीं, घर और बाहर की दुनिया के बीच जीवन की डोर बनी हुई है।

घर तक पहुंचने के लिए कहीं बांस की चचरी बनाई गई है तो कहीं लकड़ी की पगडंडी। छह-सात फीट पानी के बीच सीढ़ियां लगाकर महिलाएं घरों में जा रही हैं। कई परिवार दूसरे घरों से पीने का पानी लेने निकल रहे हैं। कुछ लोग पानी खरीदकर ला रहे हैं। रस्सी के सहारे पानी से भरे डिब्बे घरों तक खींचे जा रहे हैं।
शमशेर के घर तक पहुंचना भी आसान नहीं था। पानी के बीच बनाई गई अस्थायी पगडंडी और सीढ़ियों के सहारे आगे बढ़ना पड़ा। हर कदम संभलकर रखना था। आसपास पानी में डूबे घर और बीच-बीच में नावों की आवाज। यह सिर्फ शमशेर के घर की कहानी नहीं है। बाढ़ से घिरे लगभग हर घर में इसी तरह की जद्दोजहद चल रही है।

पिछले साल 15 फीट ऊपर था पानी
बिलाल अहमद बताते हैं कि बाढ़ के समय यहां करीब आठ फीट तक पानी आ जाता है। पिछले साल इसी समय पानी मौजूदा स्तर से करीब 15 फीट ऊपर तक पहुंच गया था। इस बार पानी कुछ कम है, लेकिन संकट खत्म नहीं हुआ। बुनकरी का काम बंद पड़ा है। घर में कंपन महसूस होने से मकान गिरने का डर बना रहता है। रोजमर्रा की जरूरत का सामान लेने के लिए भी पानी पार करना पड़ता है।
शमसुद्दीन सिद्दीकी नगर में ई-रिक्शा चलाते हैं। बताते हैं कि सामान्य दिनों में काम खत्म कर रात करीब 10 बजे घर पहुंचते हैं, लेकिन बाढ़ के कारण नाव सेवा शाम छह बजे बंद हो जाती है। इसलिए उन्हें काम छोड़कर जल्दी घर लौटना पड़ा। उनके लिए छह बजे से पहले घर पहुंचना मजबूरी है।
नाव में घर का सामान, आंखों में घर पहुंचने की जल्दी
आरके के मालिक नाव से घर का सामान लेकर लौटते मिले। सामान में रोजमर्रा की जरूरत का पूरा इंतजाम था। कोई खाने-पीने की चीजें लेकर लौट रहा था तो कोई दवा और पानी। नाव जैसे-जैसे घरों के करीब पहुंचती, खिड़कियों और दरवाजों पर खड़े लोगों की नजरें उस पर टिक जातीं। किसी घर में पिता अपने बेटे की राह देख रहा था, किसी घर में मां बेटी के लौटने का इंतजार कर रही थी। नाव किनारे लगती और चेहरे पर राहत उतर आती। कुछ क्षण के लिए पानी से घिरे घर में खुशी का माहौल बन जाता।
दिनभर में 60 फेरे, शाम को चिंता कोई छूट न जाए
नाविक आयुष साहनी और पंकज साहनी बताते हैं कि वे चार साल से नाव चला रहे हैं। सुबह आठ बजे से शाम छह बजे तक नाव का संचालन होता है। दिनभर में दोनों किनारों के बीच करीब 60 फेरे तक लगा देते हैं। बीमार व्यक्ति को निकालना हो या घर का सामान पहुंचाना हो, नाव हर जरूरतमंद तक पहुंचाने की कोशिश करती है।

शाम ढलने के साथ नाविकों की चिंता भी बढ़ जाती है, कहीं कोई पानी के बीच छूट न जाए। इसलिए आखिरी फेरे तक लोगों को उनके घर तक पहुंचाने की कोशिश रहती है। सूरज ढलता है, पानी पर अंधेरा उतरने लगता है और चप्पुओं की चर्र-चर्र और तेज सुनाई देने लगती है। एक तरफ नाव आगे बढ़ती है तो दूसरी तरफ घर की खिड़की से हाथ हिलाकर कोई अपने को अलविदा कहता है।
नाविकों पर पत्थर फेंकने से बढ़ी चिंता
बाढ़ में लोगों की मदद कर रहे नाविकों की सुरक्षा भी चिंता का विषय बनी है। नाविकों ने बताया कि कभी-कभी घरों की ओर से नाव पर पत्थर फेंके जाते हैं। इससे नाविकों के घायल होने की आशंका रहती है। उन्होंने ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई और नाविकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है।
वरुणा की बाढ़ का पानी भले ही घट रहा हो, मगर नक्की घाट में जिंदगी अभी भी पानी की गिरफ्त में है। पानी की घर्र-घर्र के बीच चप्पुओं की चर्र-चर्र लोगों को सजग करती है। हर आवाज के साथ किसी के घर में उम्मीद जगती है, शायद नाव में आज उनका अपना लौट रहा है।
