वाराणसी (राकेश पांडेय)। डीजल रेल इंजन कारखाना (डीरेका) को सुदृढ़ करने की जितनी कोशिश केंद्र सरकार की ओर से की जा रही है, प्रबंधन उसके प्रति उतना ही लापरवाह रवैया अपनाए है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की आई रिपोर्ट के अनुसार डीरेका ने केंद्र सरकार को एक हजार करोड़ से अधिक का झटका दिया है।

इतना ही नहीं, डीरेका की ओर से रेलवे बोर्ड के दिशा-निर्देशों को दरकिनार करते हुए करोड़ों रुपये के सामान ऊंचे दाम में आयात किए गए। उन्हें न तो खुद तैयार करने की कोशिश की गई, ना ही घरेलू आपूर्तिकर्ताओं पर भरोसा किया गया। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक व मनमानी से डीरेका ने केंद्र सरकार को करीब 1366 करोड़ रुपये का घाटा कराया है। इसमें हर स्तर की मितव्ययिता व निर्देशों को अनसुना किए जाने की स्थिति शामिल है।

कैग का निष्कर्ष है कि सिर्फ ट्रांसफर ऑफ टेक्नालॉजी (टीओटी) की प्रक्रिया को पूरा न करने की स्थिति के चलते ही डीरेका करीब 803.73 करोड़ रुपये की हो सकने वाली बचत नहीं कर पाया। इतना ही नहीं इससे और बड़ा नुकसान यह हुआ कि इंजन बनाने के प्रमुख सामान की आपूर्ति के मामले में विदेशी कंपनियों पर आश्रित रहना पड़ा।

रेलवे बोर्ड ने डीरेका को निर्देश दिया था कि इंजन निर्माण के महत्वपूर्ण पार्ट क्रैंककेस के आयात से बचते हुए उसका निर्माण कारखाना खुद करे या घरेलू कंपनियों से खरीदे। जरूरत हो तो इंजन निर्माण की योजना में परिवर्तन भी करे। बावजूद इसके डीरेका प्रबंधन ने ऊंचे दाम में सितंबर 2014 से नवंबर 2015 के बीच 81 क्रैंककेस का आयात करने में 59.28 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च किए।

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यह वह दौर था जबकि मेक इन इंडिया की योजना को परवान चढ़ा रहे थे, जबकि डीरेका रेलवे बोर्ड के निर्देश को दरकिनार कर विदेशी उपकरणों को आयात करने में जुटा था।

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