वाराणसी, जेएनएन। बाढ़ उतार पर आने के साथ स्वास्थ्य विभाग ने गंगा-वरुणा तटवर्ती क्षेत्रों में डेंगू समेत मच्छर जनित बीमारियों को लेकर सक्रियता भले बढ़ाई हो दूसरा सिरा हाथ से पूरी तरह छूटता नजर आया। इसका खामियाजा बरसात के पानी से पखवारे भर बाद भी जलाजल मोहल्लों में रहने वालों को उठाना पड़ रहा है। इससे सर्वाधिक पीडि़त वरुणापार का शिवपुर से सारनाथ तक शहरी इलाका है। इसका अंदाजा सिर्फ पं. दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल एसएसएच लैब की रिपोर्ट से लगा सकते हैैं। इसके आंकड़ों के अनुसार पखवारे भर में डेंगू के 35 केस सामने आए। इसमें 78 संदिग्धों में से 39 के डेंगू पीडि़त होने की पुष्टि हुई। खास यह कि इसमें 35 बनारस के, जिसमें 18 वरुणापार के विभिन्न मोहल्लों से हैैं। 

पूरे सीजन की बात करें तो शहर से लेकर गांव तक छोटे-मोटे अस्पताल भी खंगाल लें तो यह आंकड़ा 200 के पार जाएगा। हालांकि स्वास्थ्य विभाग की लिखा-पढ़ी में यह संख्या 116 पर ठिठकी पड़ी है लेकिन अक्टूबर में मरीजों की संख्या बढऩे के सच को महकमा भी दरकिनार नहीं कर सका। 

जगाने वाले खुद चादर तान सो गए 

रही बात कारण की तो इसे बताने या समझाने की जरूरत नहीं। मोहल्लों में पखवारे भर बाद भी सड़ांध मार रहे बरसाती पानी से लगाया जा सकता है। यह स्थिति तब है जब डेंगू सीजन चालू होने से पहले स्वास्थ्य विभाग की देखरेख में नगर निगम-जलकल व पंचायती राज समेत 12 विभागों ने जागरूकता अभियान चलाया। इसका असर घरों में तो जरूर नजर आया लेकिन अमले खुद अमल नहीं कर सके। इसकी गवाही वेक्टर बार्न डिजीज प्रकोष्ठ के नोडल अधिकारी डा. एसएस कन्नौजिया की स्वीकारोक्ति से हो जाती है। उनका कहना है कि सितंबर में हुई बारिश के कारण अक्टूबर में डेंगू का ट्रेंड बढ़ा है। 

डाक्टरों की कालोनी तक महफूज नहीं 

बरसात के बाद गली-मोहल्लों में बरसाती पानी फंसा पड़ा है तो पांडेयपुर जैसे नाले आफत के परकाले स्वरूप दिख जाएंगे। जानकर हैरत में रह जाएंगे कि दूसरों को जागरूकता का पाठ पढ़ाने वालों का नेतृत्व करने वाले विभाग की कालोनी भी डेंगू मच्छर से महफूज नहीं रही। इस माह की रिपोर्ट के अनुसार पांडेयपुर के आधा दर्जन पीडि़तों में तीन डाक्टर्स कालोनी और पं. दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल के ही हैैं। 

हाथ खाली कैसे हो रखवाली 

वेक्टर बार्न डिजीज कंट्रोल नियमावली के तहत जहां कहीं डेंगू पीडि़त मिलें, उनके घरों से लेकर आसपास तक पायरेथ्रम का छिड़काव कराया जाना चाहिए। इसके लिए शहरी मलेरिया इकाई के पास सिर्फ 24  सदस्यीय टीम है जिसे मौके पर पहुंचने तक पखवारे भर का समय लग जाता है। इस अवधि में डेंगू मच्छर विस्तार पाने का भरपूर अवसर पाता है। शहरी मलेरिया इकाई के पास सृजित 108 पदों के सापेक्ष सिर्फ 22 फील्ड कर्मचारी ही बचे हैं। सेवानिवृत्ति के बाद इनमें कोई तैनाती ही नहीं की गई। वहीं जिला मलेरिया विभाग में डीएमए व एडीएमओ के अलावा चार निरीक्षक व दो फील्ड वर्कर बचे हैं। लिहाजा विशाल क्षेत्र व आबादी में तीस स्टाफ के जरिए सिर्फ रोग-बीमारी की सूचना के बाद गांव से लेकर शहर तक भागदौड़ का ही रूटीन है। 

दो साल से संविदा कर्मियों का इंतजार 

कर्मचारियों की कमी को देखते हुए दो साल पहले दैनिक मजदूरी पर कर्मचारियों की तैनाती के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया था। इसके लिए अब बजट मिला भी तो तैनाती के लिए सेवायोजन विभाग का मुंह देखा जा रहा है। इनके जरिए नालियों में मच्छरों के लार्वा व अन्य स्रोत नष्ट कराने के साथ लार्वारोधी छिड़काव कराया जाना है। 

डेंगू से डरे नहीं, रहें सतर्क 

एडीज एजेप्टाई प्रजाति का मच्छर डेंगू का वाहक है। डेंगू के लिए जिम्मेदार फ्लैवी वायरस से संक्रमित मच्छर के काटने पर व्यक्ति इसकी चपेट में आता है। डेंगू मच्छर तभी खतरनाक है जब वह किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आए। 

बचाव : घर के आसपास गड्ढों में साफ पानी भी न जमने दें या उसमें केरोसिन डालें। कूलर का पानी बदलते रहें। मटकी, प्रयोग किए टायर, डब्बे आदि में एकत्र पानी गिरा दें। पूरी बांह के कपड़े पहनें। दिन में सोते समय भी मच्छरदानी लगाएं। 

लक्षण : डेंगू के लक्षण ज्यादातर वायरल फीवर से होते हैं। इसमें तेज बुखार, शरीर का तापमान कम न होना, सिर व बदन में तेज दर्द, पेट और आंखों के पीछे दर्द, जोड़ों व मांसपेशियों में दर्द व अकडऩ, शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर हो जाता है। स्थिति गंभीर होने पर मिचली-उल्टी व  रक्त स्राव हो सकता है। इस अवस्था को डेंगू हेमोरेजिक फीवर कहते हैं। 

बच्चे अधिक सेंसेटिव : बच्चे व बुजुर्ग डेंगू के प्रति अधिक संवेदी होते हैं। मधुमेह के रोगी भी इसकी चपेट में जल्दी आते हैं। ऐसे में इनके प्रति अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है। 

अन्य कारणों से भी गिरता है प्लेटलेट : व्यक्ति के शरीर में प्लेटलेट डेढ़ लाख से साढ़े चार लाख प्रति क्यूबिक मिमी होना चाहिए। डेंगू के साथ मलेरिया, टायफाइड, ल्यूकिमिया आदि कारणों से भी कम हो सकता है। डेंगू के मामले में 30 हजार से कम प्लेटलेट होने पर नाक या मलद्वार से रक्त स्त्राव होने लगता है। प्लेटलेट गिरने से भी घबड़ाने की आवश्यकता नहीं है। यह खानपान से जल्द ही सामान्य हो जाता है। हालांकि इसका फायदा झोलाछाप उठाते हैैं। 

पोषक आहार से 80 फीसद को लाभ : शरीर पर लाल चकत्ते दिखें तो मरीज को अस्पताल ले जाएं। चिकित्सक की सलाह से दवा लें। खानपान पर विशेष ध्यान दें। हरी सब्जी, मौसमी फल और तरल पदार्थ यथा दाल का पानी, दूध, सूप, जूस आदि ज्यादा मात्रा में सेवन करें। डेंगू के मामले में 80 फीसद पोषक आहार व सामान्य दवाएं लेने से ही स्वस्थ हो जाते हैं। 

निश्शुल्क जांच व इलाज : ध्यान दें, डेंगू का संदेह हो तो सरकारी अस्पताल जाएं। दीनदयाल अस्पताल व बीएचयू स्थित एसएसएच लैब की जांच ही डेंगू के लिए अधिकृत तौर पर पुष्ट मानी जाती है। दीनदयाल व मंडलीय अस्पताल में अलग से डेंगू वार्ड भी हैैं। इनमें जांच व इलाज निश्शुल्क है।

फागिंग के नाम पर नगर निगम की धुआंबाजी

मच्छरों का डंक जनता को बीमार कर रहा है और जिम्मेदार महकमा मच्छरदानी लगाकर चैन से सो रहा है। बात नगर निगम की हो रही है जो अब तक फागिंग के नाम पर सिर्फ व सिर्फ धुआंबाजी की करता आ रहा है। नगर निगम के स्वास्थ्य विभाग की कागजों में तैयारी तो जमकर होती है। वार्डवार 15 दिनों का पूरा ब्योरा बनाया जाता है लेकिन धरातल पर कुछ ही इलाकों में फागिंग वाहन घूमाकर कोरम पूरा कर लिया जाता है। 

नगर निगम के रिकार्ड के अनुसार अगस्त माह में फागिंग कराई गई थी लेकिन मच्छरों के डंक से लोगों को राहत नहीं मिली। इस फागिंग अभियान में बहुत से इलाकों में वाहन घूमा भी नहीं। बात वरुणापार के खजुरी इलाके की करें तो वहां के लोगों का कहना है कि उन्होंने बीते कई साल से फागिंग मशीन को खजुरी में आते देखा ही नहीं है। व्यापार मंडल व कांग्रेस के नेता मनीष चौबे का कहना है कि इलाके में फागिंग होती तो यहां पर डेंगू व मलेरिया से लोग बीमार होते। स्वास्थ्य विभाग का रिकार्ड भी गवाह है कि इस इलाके में सर्वाधिक डेंगू व मलेरिया के मरीज पाए गए हैं। सिकरौल वार्ड के मनोज कन्नौजिया का कहना है कि चूंकि इस इलाके में जिले अफसर निवास करते हैं, इसलिए फागिंग मशीन तो आती है लेकिन धुआं छोड़कर चली जाती है। उसका असर मच्छरों पर नहीं होता है। 

फागिंग में कोई कमी नहीं छोड़ते 

प्रभारी नगर स्वास्थ्य अधिकारी आरएस यादव का कहना है कि फागिंग कराने में कोई कमी नहीं छोड़ते हैं। फागिंग मशीन के अलावा जोनवार साइकिल मशीन भी है। जहां भी डेंगू व मलेरिया के मरीज होने की जानकारी होती है तो वहां पर साइकिल मशीन से फागिंग कराई जाती है। डेंगू के मरीजों की पुष्टि होने पर उसके घर व आसपास लार्वा को नष्ट करने का कार्य भी कराया जाता है। 

बकरी का दूध हुआ 70 रुपये किलो

डेंगू के मरीजों की संख्या बढऩे के कारण नगर में बकरी के दूध व पपीता के पत्ती की मांग बढ़ गई है। इस कारण बकरी का दूध नगर में 70 रुपये किलो तक बिक रहा है। हालांकि कुछ ऐसे भी लोग हैं जो डेंगू के नाम पर फ्री में भी दूध दे रहे हैं। नदेसर निवासी मोहम्मद पप्पू का कहना है कि उनके पास डेंगू के मरीजों के लिए फ्री में दूध मिलता है। हालांकि इन देसी उपायों को इलाज में उपयोगी होने के दावों को चिकित्सक नकार देते हैं। कहना है कि यह सिर्फ भ्रांति है।

Posted By: Abhishek Sharma

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