कुमार अजय, वाराणसी : किसी भी शाम अगर आप सेनपुरा चौराहे से लहुराबीर की ओर जा रहे हों तो चौराहे से कोई दस बीस कदम आगे बढ़ते ही छनन-मनन की आवाज आपके कानों में आने लगेगी, मक्खन के तड़के की सुगंध नथुने फड़काने लगेगी। दरअसल यह कमाल है चेतगंज वाले सतीश भइया के दहकते तवे का जिस पर दक्षिण भारतीय व्यंजन उत्तपम का बनारसी संस्करण आकार ले रहा है, तेल-घी से नहीं सीधे मक्खन से नहा रहा है। सच कहें तो परदेशी आइटम को देशी अंदाज में पकाने का यह प्रयोग ही सतीश बाबू के 'आइटम' को औरों से अलग बनाता है, अलबेले स्वाद के रसिया बनारसियों की रसना को लुभाता है।

कच्चे दाल और चावल के खमीरी घोल को चौड़े-चकले दहकते तवे पर चपाती का आकार देने के बाद उस पर बारीक कटे टमाटर-प्याज और धनिया-मिर्च को बुरकते हुए सतीश गुरु कहते हैं 'मखनिया उत्तपम क खासियते ई हौ कि एके खाली मक्खन में सिझावल जाए, आउर गुलाबी रंगत तक पहुंचा के करारापन जगावल जाए। एक बात सबसे जरूरी आउर हौ कि मक्खन पियावे में अगर करबा कंजूसी, त तय हौ कि आइटम हो जाई खरी-भूंसी।'

इस संवाद के पूर्णता पाने तक तवे पर छनक रहे उत्तपम की कतार सुर्ख और करारी हो चुकी थी, राई के बघार वाली नारियल की चटनी के साथ थाली में सजने की पूरी तैयारी हो चुकी थी।

कहते हैं सतीश 'जगह-जगह के रहन-सहन के मतिन हर जगह के स्वाद में भी फरक होला, ओहर के लोग (दक्षिण भारत) एही उत्तपम में नरमी खोजेलन। एकरे उलट बनारसी जीभ सोंधेपन क दीवानी हौ, इहां कचौड़ी-जलेबी से ले के हर आइटम में खरेपन पर जोर हौ, अइसे में तय हौ कि हमार कारीगरी बनारसी चाहत की ओर हौ। एही से हम अपने आइटम के तैयारी में दूसर कउनो तेल-घी नहीं खपाइला, निखालिस मक्खने से अलबेले सवाद क जादू जगाइला। एही हाल चटनी क भी हौ। मद्रासी चटनी नरियरी क हरियरी मांगेला, अपने ¨हया सोंधापन के चक्कर में चना दाल के भुंजाई क काफी खियाल रक्खल जाला।' पिटारा नरम-गरम इडली का

उत्तपम के साथ सतीश के पास एक पिटारा नरम-गरम इडली का भी है। अपने सुडौल आकार और चटनी की चटखार के लिए मशहूर इडलियों का यह काउंटर सतीश के पिता ज्ञानेश्वर 'गुड्डू' संभालते हैं। सतीश की इस खास पेशकश की बनारसियों के साथ ही दक्षिण भारतीय तीर्थ यात्रियों के बीच भी काफी मांग है।

Posted By: Jagran

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