आईआईटी बीएचयू के दो शोध समूहों ने मिलकर विकसित की बैक्टीरिया से लड़ने की नई तकनीक
आईआईटी बीएचयू के शोधकर्ताओं ने हरी रोशनी से सक्रिय होने वाली एक नई तकनीक विकसित की है, जो बैक्टीरियल संक्रमण ...और पढ़ें

आईआईटी बीएचयू का कमाल: हरी रोशनी से बैक्टीरिया का होगा खात्मा, नई तकनीक विकसित।
HighLights
हरी रोशनी से सक्रिय नई तकनीक बैक्टीरिया नष्ट करने में प्रभावी।
बायोफिल्म को 85% तक कम करने में मिली सफलता।
संक्रमित घावों को 11 दिन में 99% तक भरा।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (काशी हिंदू विश्वविद्यालय) यानी आइआइटी बीएचयू वाराणसी के दो शोध समूहों के संयुक्त प्रयास से बैक्टीरियल संक्रमण से लड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई है।
संस्थान के रसायन विज्ञान विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. साम्या बनर्जी और स्कूल ऑफ बायोमेडिकल इंजीनियरिंग के डॉ. सुदीप मुखर्जी के शोध समूहों ने मिलकर ऐसी नई प्रकाश-सक्रिय तकनीक विकसित की है, जो हरी रोशनी के संपर्क में आने पर बैक्टीरिया को नष्ट करने में प्रभावी पाई गई है। इस महत्वपूर्ण शोध को विश्वप्रसिद्ध नेचर पोर्टफोलियो के प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘कम्युनिकेशंस केमिस्ट्री’ में प्रकाशित किया गया है।
‘ग्रीन-लाइट-एक्टिवेटेड ओस्मियम (II) मेटालोफोटोएंटीबायोटिक्स फॉर एंटीबैक्टीरियल थेरेपी एंड इन्फेक्टेड वाउंड हीलिंग’ शीर्षक से प्रकाशित इस शोध में विकसित विशेष रासायनिक यौगिकों ने प्रयोगशाला परीक्षणों में बैक्टीरिया की वृद्धि रोकने के साथ-साथ उनके द्वारा बनाई जाने वाली बायोफिल्म को भी प्रभावी ढंग से बाधित किया। संक्रमित घावों के उपचार के लिए चूहों पर किए गए प्रयोग में भी उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं।
हरी रोशनी से सक्रिय होकर बैक्टीरिया पर करता है असर
शोधकर्ताओं ने ऑस्मियम आधारित तीन विशेष यौगिक विकसित किए हैं, जिन्हें मेटालो-फोटोएंटीबायोटिक्स कहा जाता है। इनकी खासियत यह है कि हरी रोशनी के संपर्क में आने पर ये सक्रिय होकर ऐसे प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन अणु उत्पन्न करते हैं, जो बैक्टीरिया की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं और उनकी वृद्धि को रोकते हैं।
शोध में इन यौगिकों का परीक्षण ई. कोलाई, स्टैफिलोकोकस ऑरियस और बैसिलस सब्टिलिस जैसे बैक्टीरिया पर किया गया। तीनों यौगिकों में ओएस-1 (Os1) ने सबसे बेहतर प्रदर्शन किया।
बायोफिल्म पर भी प्रभावी
बैक्टीरिया द्वारा बनाई जाने वाली बायोफिल्म संक्रमण के उपचार में बड़ी चुनौती होती है। यह एक तरह की सुरक्षात्मक परत होती है, जिसके भीतर बैक्टीरिया सुरक्षित रहते हैं और संक्रमण को लंबे समय तक बनाए रख सकते हैं।
शोध में पाया गया कि ओएस-1 को हरी रोशनी के साथ इस्तेमाल करने पर ई. कोलाई और बैसिलस सब्टिलिस की बायोफिल्म में करीब 85 प्रतिशत तक कमी आई। इतना ही नहीं, पहले से बनी परिपक्व बायोफिल्म को भी बाधित करने में यह उपचार प्रभावी पाया गया।
संक्रमित घाव 11 दिन में करीब 99 प्रतिशत तक भरा
तकनीक की प्रभावशीलता की जांच के लिए बैक्टीरिया से संक्रमित घावों वाले चूहों पर भी अध्ययन किया गया। ओएस-1 और हरी रोशनी से उपचारित घावों में संक्रमण कम हुआ और घाव भरने की प्रक्रिया तेज हुई।
अध्ययन के अनुसार, उपचार के 11वें दिन ओएस-1 और हरी रोशनी से उपचारित घाव करीब 99 प्रतिशत तक बंद हो गए। ऊतक परीक्षण में भी घाव भरने और ऊतक पुनर्निर्माण से जुड़े सकारात्मक परिणाम सामने आए।
एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस से मुकाबले की दिशा में नई उम्मीद
एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी दवाओं के खिलाफ बैक्टीरिया की बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता आज दुनिया के सामने बड़ी स्वास्थ्य चुनौती है। शोधकर्ताओं का यह अध्ययन प्रकाश की मदद से बैक्टीरिया को नियंत्रित करने की एक नई वैज्ञानिक रणनीति की संभावनाएं सामने रखता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, मानव उपचार में इसके संभावित उपयोग से पहले दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया पर व्यापक परीक्षण और दीर्घकालिक सुरक्षा संबंधी अध्ययन आवश्यक होंगे।
रसायन विज्ञान और बायोमेडिकल इंजीनियरिंग का संगम
यह शोध डॉ. साम्या बनर्जी के नेतृत्व वाले रसायन विज्ञान शोध समूह और डॉ. सुदीप मुखर्जी के नेतृत्व वाले स्कूल ऑफ बायोमेडिकल इंजीनियरिंग शोध समूह का संयुक्त प्रयास है। शोध दल में अपूर्व मंडल, देबायनी चक्रवर्ती, आरिफ अली मंडल, रोहित पांडेय, आशीष कुमार अग्रवाल, राशि गौतम और स्वीटी तिवारी भी शामिल हैं। शोध में फार्मास्यूटिकल इंजीनियरिंग के विशेषज्ञों का भी योगदान रहा।
प्रतिष्ठित नेचर पोर्टफोलियो जर्नल ‘कम्युनिकेशंस केमिस्ट्री’ में इस शोध का प्रकाशन आइआइटी बीएचयू की अंतरविषयी शोध क्षमता और स्वास्थ्य क्षेत्र की महत्वपूर्ण चुनौतियों के समाधान के लिए किए जा रहे संस्थान के प्रयासों को रेखांकित करता है।
