आजमगढ़, जेएनएन। अंतरराष्ट्रीय फिल्म उत्सव के अंतिम दिन सोमवार को शारदा टाकीज में हरिजीत सिंह निर्देशित व पवन मल्होत्रा अभिनीत चर्चित पंजाबी फिल्म एह जन्म तुम्हारे लेखे और छत्तीसगढ़ी फिल्म धुमकुडिय़ा भी दिखाई गई। फिल्म धुमकुडिय़ा में झारखंड के आदिवासियों की समस्याओं को दर्शाया गया है। इस दौरान प्रदेश भर से आए युवाओं को सूत्रधार के संयोजक अभिषेक पंडित ने प्रमाण पत्र दिया।

अंतिम सत्र में धुमकुडिय़ा फिल्म के निर्देशक नंदलाल नायक और निर्माता सुमित अग्रवाल के साथ संवाद भी हुआ। कार्यक्रम में पहुंचे जिलाधिकारी एनपी सिंह ने कहा बिना कला के मनुष्य संवेदनहीन है। समारोह में दिखाई जा रही दलित एवं आदिवासी केंद्रित सिनेमा की प्रशंसा की। श्री सिंह ने कहा कि इस तरह के सिनेमा की जरूरत समाज को बहुत ज्दादा है। शहर भले ही इक्कीसवीं सदी में जी रहा है पर आदिवासी अभी भी पाषाण युग में जी रहे हैं। इस तरह का सिनेमा लोगों को सामूहिकता में एकजुट होकर जीने की कला सीखने एवं संवेदनशील बनने के लिए प्रेरित करता है। युवाओं ने डीएम से प्रशासन से जुड़े सवाल भी पूछे और उन्होंने बड़ी ही सरलता से उत्तर भी दिया। कहा कि अच्छी फिल्मों से विचारों में स्पंदन होता है और हम अपने भीतर एक बदलाव महसूस करते हैं। एक छात्र द्वारा परंपरा से जुड़े सवाल पर श्री सिंह ने कहा कि परंपरा और आधुनिकता में समन्वय होना चाहिए। कहा कि कला तपस्या है और हर व्यक्ति तपस्वी नहीं हो सकता। ममता पंडित एवं अभिषेक पंडित के कार्यों की उन्होंने जमकर तारीफ की। सयोजक अजीत राय ने समापन भाषण में सभी आगंतुकों, जिला प्रशासन, जनपदवासियों को इस आयोजन को सफलता पूर्वक संपन्न कराने के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।

विचारों के प्रति ईमानदार हैं जनपद के लोग

फिल्म उत्सव के आखिरी दिन वरिष्ठ रंगकर्मी व प्रमुख कर्ता-धर्ता अभिषेक पंडित ने बाहर से आए युवाओं के साथ खुला संवाद किया। बनारस से आए एक प्रतिभागी ने सवाल किया कि आजमगढ़ के दर्शकों की संख्या काफी कम है, जबकि हम लोग इतनी दूर से चलकर आए हैं। इस पर उन्होंने कहा कि यहां कई तरह की बातें हैं, अलग-अलग विचार हैं लेकिन यहां के लोग विचारों के प्रति काफी ईमानदार हैं। अगर उन्होंने ठान लिया कि किसी कार्यकम में नहीं जाना है तो कतई नहीं जाते। मैं यहां की विचारधारा और यहां के लोगों की सोच को बदलना चाहता हूं। यही कारण है कि फिल्म फेस्टिवल का आयोजन आजमगढ़ में करता हूं। हमारा प्रयास चलता रहेगा और यहां के लोगों की सोच भी बदलेगी। उन्होंने कहा कि सिनेमा बहुत कुछ सिखाता है और यहां के लोगों को भी जरूर सीख मिलेगी।

सिनेमा भारतीय विधा नहीं

अंतरराष्ट्रीय फिल्म समीक्षक अजीत राय ने कहा कि फिल्म भारतीय विद्या नहीं है। यह पेरिस में 1895 में जन्मा और वहीं पहला प्रदर्शन भी हुआ। सिनेमा टेक्नोलॉजी में ज्ञान का समायोजन है। सिनेमा एक प्रकार से हमारी विचारधारा और कहानी को प्रस्तुत करने का विजुअल माध्यम है और रोड-टू-संगम ने कुछ ऐसा ही संदेश दिया है। भारत में फिल्म निर्माण की जानकारी देते हुए बताया कि भारत में पेरिस के 8 महीने बाद उस समय पहुंची जब वहां के लोग उसे किसी देश में ले जाना चाहते थे। जहाज में कुछ कमी आने कारण मुंबई के काला घोड़ा इलाके में जहाज रुक गया तो वहां एक जवान ने सोचा कि क्यों न यहीं फिल्म दिखा दी जाए। उसके बाद अपने यहां 1913 में पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र बनी। हमारा आरंभिक मूल का सत्य राजा हरिश्चंद्र में देखने को मिलता है।

Posted By: Saurabh Chakravarty

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