वाराणसी, जेएनएन। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के हवन कुंडों में तीन दशक बाद वेद मंत्रोच्चार सुनने को मिला। विश्वविद्यालय ने राष्ट्र के कल्याण के लिए 13 जुलाई को 'मित्रविंदा' यज्ञ आयोजित किया है। विश्वविद्यालय ने इस यज्ञ तिरूपति के डा. ओंकार सेलूकर और उनकी पत्‍‌नी राजश्री सेलूकर बुलाया है। उन्होंने इसका आगाज शुक्रवार को 'अन्वारम्मणीय' यज्ञ से हुआ। इस दौरान सेलूकल दांपति ने 'वषट्कार वौउषट्' का मंत्रोचार के साथ पीपल की लकड़ी से आहुति दी। यज्ञ में ब्रह्मा, होना, अन्ध्वर्यु, अग्नीत् के प्रतीक चार अन्य विद्वान शामिल थे। इस क्रम में उन्होंने सुबह-शाम दोनों समय अग्निहोत्रम यज्ञ किया।

भारतीय परंपरा में जिस प्रकार शुभ कार्य शुरू करने के लिए गणेश पूजा का विधान है। उसी प्रकार विशेष यज्ञ करने से पहले 'अन्वारम्मणीय' यज्ञ का विधान है। खास बात यह है कि 'मित्रविंदा' यज्ञ के लिए अग्निहोत्र की जरूरत पड़ती है। काशी में अग्निहोत्र कोई नहीं है। इसके चलते वेंकटेश्वर वेद विश्वविद्यालय (तिरूपति) डा. ओंकार सेलूकर और उनकी पत्‍‌नी राजश्री सेलूकर बुलाए गए हैं। अग्निहोत्र यज्ञ अग्निहोत्र एक वैदिक यज्ञ है जिसका वर्णन यजुर्वेद में मिलता है। अग्निहोत्र एक नित्य वैदिक यज्ञ है।

यह यज्ञ प्रतिदिन सुबह व शाम करने का विधान है। इस यज्ञ सुख-शांति की अनुभूति, स्वास्थ्य, वायु मंडल की शुद्धि सहित अनेक लाभ है। खास बात यह है अग्निहोत्र यज्ञ करने वाले के घर सदैव अग्नि प्रज्ज्वलित होती रहती है। वह इसी अग्नि से खाना भी खाते हैं। ऐसे में अग्निहोत्र यज्ञ करने वाले घर के बाहर का खाना नहीं खाते हैं। किन्हीं कारणवश यदि बाहर जाना हुआ वह 'अग्नि मंथन' से अग्नि प्रज्ज्वलित करते हैं। 'अग्नि मंथन' अग्निहोत्र यज्ञ की दीक्षा लेने वाले लोगों को 'अग्नि मंथन' नामक एक विशेष प्रकार यंत्र दिया जाता है। मथनी की तरह लकड़ी के बने यंत्र को मथने से अग्नि प्रज्ज्वलित होती है।

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