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पूर्वांचल के आठ जिलों में 500 किलोमीटर प्रचार का भाजपा को नहीं मिला मौका, सपा ने यहीं मार ली बाजी

By Raghvendra Chandra Shukla Edited By: Abhishek sharma
Published: Thu, 29 Oct 2026 08:09 PM (IST)

भाजपा को वाराणसी खंड एमएलसी चुनाव में प्रत्याशी चयन में देरी और प्रचार के लिए कम समय मिलने से नुकसान ...और पढ़ें

वाराणसी एमएलसी चुनाव: भाजपा की प्रत्याशी चयन में देरी, सपा को मिली बढ़त।

वाराणसी एमएलसी चुनाव: भाजपा की प्रत्याशी चयन में देरी, सपा को मिली बढ़त।

HighLights

  1. भाजपा को प्रत्याशी चयन में देरी का खामियाजा भुगतना पड़ा।

  2. सपा ने डेढ़ साल पहले ही प्रत्याशी तय कर प्रचार किया।

  3. भाजपा मतदाता बनाने और जमीनी संपर्क में पीछे रही।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। शिक्षक और स्नातक एमएलसी का चुनाव लड़ने की तैयारी के लिए किसी भी प्रत्याशी को कम से कम तीन वर्ष का समय तो जरूर मिलना चाहिए। वाराणसी खंड में आठ जिलों तक पहुंचने के लिए एक छोर से दूसरे छोर तक की दूरी लगभग 500 किलोमीटर है। समय मिलने पर ही प्रत्याशी हर जिलों में जाकर मतदाता से संपर्क कर पाएगा। भाजपा यहीं चूकी और सपा ने यहीं पर पहली बाजी मार ली थी।

पिछला चुनाव जीतने के बाद से ही सपा के दोनों एमएलसी लाल बिहारी यादव और आशुतोष सिन्हा चुनाव प्रचार में जुट गए थे। तकरीबन डेढ़ साल पहले ही सपा ने दोनों को दोबारा प्रत्याशी बना दिया। उन्हें समय मिला और प्रचार तेजी से हुआ। उधर भाजपा के पास प्रत्याशी ही नहीं था। पिछले चुनाव में जीत से कुछ कदम दूर रहे डा. प्रमोद कुमार मिश्रा और केदारनाथ सिंह को भाजपा ने अपना प्रत्याशी बनाया। यह चयन भी नामांकन के समय हुआ। दोनों प्रत्याशियों काे प्रचार का पूरा मौका तक नहीं मिल पाया।

मतदाता बनाने में पीछे रही भाजपा
प्रमुख राजनीतिक दल एमएलसी चुनाव से पहले अपने मतदाता बनाकर ही 50 प्रतिशत जीत तय कर लेते हैं। भाजपा का संगठन यहां भी चूका और मोदी-योगी के सहारे बैठा रहा।

स्वयं मतदाता ही नहीं एक मंत्री व दो विधायक
भाजपा के एक मंत्री, दो विधायक समेत काशी एवं जिला महानगर के कई बड़े पदाधिकारी स्वयं मतदाता ही नहीं थे। इन्होंने अपना नाम तक स्नातक मतदाता सूची में नहीं डलवाया। एक मंत्री के कालेज में 189 शिक्षक तैनात हैं वहां मतदाता फार्म ही नहीं भरा गया। इसके अलावा भाजपा के कई रसूखदारों के पास अपने-अपने कालेज हैं, जहां से वह हजारों की संख्या में शिक्षक और स्नातक मतदाता बना सकते थे।

सरल एप तक बीजेपी, कठिन राह तय नहीं कर पाई
भाजपा का प्रचार भी उसके सरल ऐप पर तक सीमित रह गया है। पदाधिकारियों को जो जिम्मेदारी दी जाती है वह उसे सरल ऐप पर फोटो के साथ अपलोड करते हैं। कई ऐसे भी थे जिन्होंने अपने आसपास की फोटो अपलोड की और दूसरे काम में लग गए। जागरूकता और जनता से जुड़ाव का यह चुनाव यहां भी बीजेपी हारी।

एक शिक्षक से मिलकर चले गए
मतदान से दो दिन पहले एक मंत्री आए और उन्हें नदेसर में प्रचार करना था। वह एक शिक्षक से मिले और वापस चले गए। कभी यह चुनाव पोस्टकार्ड पर खत लिखकर लड़ा जाता था लेकिन इसे जनसभा के जरिए जीतने का प्रयास करना भी भाजपा पर भारी पड़ा। संपर्क के दौरान प्रथम वरीयता का मत न मिले तो दूसरी वरीयता मांगी जाती है। यह भी नहीं किया गया।