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काशी की वह रामलीला जहां मृदंग की धुन तीन पीढ़‍ियों से पात्रों के संवाद को करती है जीवंत

By Dhyan chandra SharmaEdited By: Abhishek sharma
Published: Sun, 11 Oct 2026 06:16 PM (GMT+05:30)

वाराणसी के शिवपुर में 150 साल पुरानी रामलीला अपनी अनूठी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है, जहां सेठ परिवार की तीन ...और पढ़ें

HighLights

  1. सेठ परिवार की तीन पीढ़ियों की निःस्वार्थ मृदंग सेवा।

  2. शिवपुर की 150 वर्ष प्राचीन रामलीला की अनूठी परंपरा।

  3. चौपाइयों और दोहों पर मृदंग की धुन अद्वितीय प्रस्तुति।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। करीब डेढ़ सौ वर्ष प्राचीन शिवपुर की प्रसिद्ध 33 दिवसीय रामलीला अपने कई मायनों के लिए विशेष रूप से जानी जाती है। श्री राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न और माता सीता का रोल अदा करने वाले यहां के बाल स्वरूप कलाकार बरबस ही लीला प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं।

लीला का प्रारंभ प्रतिदिन श्री रामचरितमानस की चौपाइयों के साथ शुरू होता है तथा रामायण पाठ करने वाले बंधु पहले चौपाई और दोहे का मृदंग और झाल की धुन पर गायन करते हैं। तत्पश्चात लीला अलग-अलग भागों में मंचन होती है। उन्हें में से एक वाराणसी शिवपुर के पंचक्रोशी रोड निवासी सेठ परिवार जिनकी तीन पीढियां ने निस्वार्थ भाव से श्री रामलीला के लिए मृदंग बजाने की सेवा दे रहे हैं।

मृदंग को बजाने वाले दीनानाथ सेठ ने बताया कि बहुत पहले उनके दादा स्वर्गीय पन्नालाल सेठ ने रामलीला में निशुल्क मृदंग बजाने की सेवा दी, उसके बाद दूसरी पीढ़ी में मेरे पिता मोहनलाल सेठ ने तथा तीसरी पीढ़ी में मैं खुद प्रभु की सेवा में लगा हुआ हूं।

उन्होंने बताया कि शिवपुर के जैसी चौपाइयों का मृदंग के बीच गायन पूरे भारत में नहीं देखने को मिलता। चाहे चौपाई हो या दोहे या फिर छंद सभी पर जब मृदंग की आवाज लोगों को सुनाई देती है तो श्री राम लीला के प्रति श्रद्धालुओं का भाव और भी बढ़ जाता है।