सोनभद्र [प्रशांत शुक्ल] एक आवेग, जो सबकुछ खत्म कर दिया। भू-खंड पर अपने कब्जे को लेकर बुधवार को घोरावल कोतवाली के उभ्भा गांव में खेली गई खून की होली के दाग आज भी गांव में इधर-उधर बिखरे हैं। घटना के तीन दिन बाद भी गांव में हर तरफ मौतमी सन्नाटा है। जो रह-रहकर महिलाओं के च‍ित्कार से टूट जा रहा था। गांव के बच्चे, बूढों व महिलाओं की निगाहें हर समय सड़क की ओर टकटकी लगाए हुए हैं, शायद उनकी निगाहें उन्हें ढूंढ रही थी जो बुधावार के आवेग में उनसे हमेशा के लिए दूर हो गए। किसी की मां तो किसी का बेटा तो किसी के घर का मुखिया ही उन्हें हमेशा के लिए छोड़कर चला गया। उन्हें अब न तो उस जमीन की ङ्क्षचता है और न ही किसी राहत की चाह, बस कचोट रही है उस दिन एक पल में अपनों के खोने का गम। इस लोमहर्षक घटना में अपनों को खोने वाले लोगों से दैनिक जागरण ने उनके हालात जानने की कोशिश की।

सिर से उठ गया मुखिया का साया

मृतक रामसुंदर घर का कमाने वाला एक मात्र व्यक्ति था। एक बीघे जमीन पर वह खेती करके अपने परिवार का जीवन-यापन करता था, लेकिन बुधवार को एक ही पल में सबकुछ समाप्त हो गया। अब परिवार में रोटी के लाले पड़ गए हैं। उनकी पत्नी सीता देवी कहती हैं कि समझ में ही नहीं आ रहा कि अब मैं क्या करूं। कैसे बच्चों की परवरिश होगी। बच्चों को समझाऊं या फिर खुद को तसल्ली दूं कि वह (रामसुंदर) अब कभी भी लौटकर वापस नहीं आएंगे।

मां का कर रहे बच्चे इंतजार

गंभीर रूप से घायल रजवंती देवी के घर मेें छोटे-छोटे बच्चे मां का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन उन्हें क्या पता कि उनकी मां जिंदगी और मौत से अस्पताल में जूझ रही है। पिता की मौत पहले ही हो गई है, अब मां अपने जिंदगी के लिए संघर्ष कर रही है। रजवंती की जेठानी प्रभावती ने कहा कि बुधवार को हम लोगों के जीवन में काला दिन बनकर आया और एक झटके में सबकुछ मिटाकर चला गया। आगे कैसे जीवन चलेगा पता नहीं। 

पहाड़ सा जीवन, पल भर में हुआ समाप्त

नरसंहार में मृत जवाहिर के चार छोट-छोटे बच्चे हैं। वही घर का कमाऊं सदस्य था। उसको मात्र दो बीघा जमीन है। जिस पर खेती करके पूरे परिवार का जीवन-यापन करता था। अब उसकी मौत के बाद परिवार का सहारा ही छिन गया। उसकी पत्नी सुकवारी रो-रोकर कह रही है कि कैसे करूंगी बच्चों का पालन-पोषण। समझ में नहीं आ रहा है। एकाएक जैसे मेरी पूरी दुनिया ही उजड़ गई है। न जाने किसकी नजर मेरे परिवार को लग गई, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। लोग कह रहे हैं कि आपको सरकार पैसे देगी, कब देगी और कैसे देगी यह भी नहीं पता। 

पूरी तरह से हो गए हैं अनाथ

नागेंद्र की जान नरसंहार में चली गई। वह अविवाहिता था लेकिन मां की मौत के बाद बहन का वही सहारा था। मेहनत मजदूरी करके परिवार का परिवार चलाता था। बहन सुनीता रो-रोकर कहती है कि घर का सहारा मेरा भाई ही था जो अब इस दुनिया में नहीं है। आज घर का खर्च और अन्य जिम्मेदारी को पूरा करने वाला कोई नहीं बचा है। हर तरफ पूरी तरह से सन्नाटा पसर गया है। घर काटने को दौड़ रहा है। अब मुझको दुलार से बुलाने वाला भाई मेरे बीच में नहीं है। कैसे मेरी आगे की जिंदगी कटेगी। 

जमीन तो वहीं है, लेकिन अपने खो गए

नरसंहार में जान गवाए अशोक को दो बेटे व एक बेटी है। बच्चों का रो-रोकर बुराहाल है। वह न स्कूल जा रहे हैं न कुछ खा रहे हैं। अशोक ने अपने परिवार का पेट पालने वाली भूमि को बचाने में वह अपनी जान गंवा दिया। पत्नी लाल देवी कहती है कि अब क्या करूंगी। कैसे बच्चों को पढ़ाउंगी व जिलाऊंगी। क्या करूं हे राम। अब कुछ मुझे सिर्फ और सिर्फ अपने पति के कातिलों को कठोर से कठोर सजा दिलाना है। परिवार का बोझ सिर पर आने के बाद कुछ समझ में नहीं आ रहा है। सरकार मदद कब मिलेगी यह कोई बताने वाला नहीं है। 

नाराजगी को दूर करने नहीं मिला मौका

नरसंहार में मृत राजेश गोंड़ पूरे घर को एक सूत्र में बांधकर चलने वाला मुखिया था। उसकी बहन कबूतरी रो-रोकर कह रही थी कि बुधवार की सुबह हमसे थोड़े नाराज थे, लेकिन कुछ देरबाद मान गए। दोपहर बाद गांव में हुए शोर के बाद वह खेत की ओर घटनास्थल के पास गए, लेकिन मुझे क्या पता कि वह फिर कभी वापस नहीं आएंगे। मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा कि वह अब हमारे बीच नहीं रहे। अब कैसे भइया की नाराजगी दूर करूं। 

सिर्फ नाम की दुर्गा नहीं थी दुर्गावती

मृत दुर्गावती को लेकर पूरा परिवार सदमे में है। परिवार के लोगों को कुछ समझ में नहीं आ रही है। पति व बच्चों का रो-रोकर बुराहाल है। उसकी सास शीला देवी कहती है कि घर का सारा काम एक पैर पर करती थी, अब कौन करेगा खेती व घर का काम। प्रधान ने तो मेरा पूरा घर ही उजाड़ दिया। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं। एक पल में सबकुछ बिखर सा गया है। गोली मारने के बाद उसे लाठी-डंडे से भी मारा, कोई इतना निर्मम कैसे हो सकता है। मेरा तो पूरा घर ही उजड़ गया। 

पूरे घर की सूख लेकर गई सुखवंती

नरसंहार में मृत सुखवंती पूरे परिवार के लिए पालनहार थी। बच्चों से लेकर सभी ख्याल रखती थी। उसका भतीजा पिंटू कहता है कि मुझे तो जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा है कि अब वह हमारे बीच में नहीं हैं। कोई ऐसे कैसे छोड़ के जाता है। दिन के वक्त मुझे खाना खिलाई और कहा कि खेत में जाकर धान रोपाई करा ले। इसके बाद मैं खेत की तरफ चला गया, लेकिन मुझे क्या पता कि ताई जिस विवाद में मुझे बचाने आएगी, वह फिर वापस मेरे साथ कभी नहीं लौटेगी।

एक पल में सबकुछ उजड़ गया

गोलीबारी में मृत रामधारी ने मौत ने तो परिवार का सहारा ही छीन लिया। तीन बच्चों के सिर से जहां बाप का साया उठ गया वहीं उनकी परवरिश पर भी संकट आ गया है। मेहनत-मजदूरी कर रामधारी परिवार पाल रहा था। भाई रामनाथ कहते हैं कि भाई हमको छोड़कर चला गया, यह बात अभी तक मेरे मन में नहीं उतर पा रहा है। यह सब क्या हो गया, एक पल में सबकुछ हाथ से निकल गया। जमीन तो वहीं पर है, लेकिन मेरे अपने तो हमें छोड़कर चले गए।

 

प्रधान को धरती पर ही मिलेगी सजा

गोली लगने से मृत जवाहिर की मौत ने परिवार को तोड़ दिया है। पत्नी का कहना है कि डेढ़ बीघा में खेती करके परिवार चलाता था। मौत के बाद पत्नी का तो सहारा ही छीन गया। पहाड़ जैसी जिंदगी कैसे कटेगी इसे लेकर पत्नी बदहवास हो गई है। जावहिर की भाभी कहती हैं कि उनके साथ जिस तरह से प्रधान ने किया है, वह इसका फल इसी धरती पर भोग कर जाएगा। इतने लोगों की जिम्मेदारी किसानी करके पालते थे मेरे जवाहिर, अब तो जैसे सबकुछ अंधेरे जैसा हो गया है। कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं।

Posted By: Saurabh Chakravarty

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