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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jan 10, 2019 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

प्रवासी भारतीय दिवस : गांव के स्कूल से कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च आर्गेनाईजेशन तक का सफर

By Abhishek SharmaEdited By:
Published: Thu, 10 Jan 2019 10:31 PM (IST)Updated: Fri, 11 Jan 2019 09:35 AM (IST)

सिद्धार्थनगर डुमरियागंज के मूल निवासी अजय अग्रहरि ने गांव के प्राथमिक विद्यालय से निकलकर विश्व की सबसे बड़ी कांट्रैक्ट रिसर्च आर्गनाइजेशन तक का सफर तय किया।

प्रवासी भारतीय दिवस : गांव के स्कूल से कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च आर्गेनाईजेशन तक का सफर
प्रवासी भारतीय दिवस : गांव के स्कूल से कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च आर्गेनाईजेशन तक का सफर

वाराणसी [मुहम्‍मद रईस]। गांव की माटी में सिर्फ अनाज नहीं उपजते, बल्कि ऐसी मेधा भी जन्मती है, जो देश-दुनिया के नक्शे पर अमिट छाप छोड़ती है। टूटे-फूटे चप्पल और फटी कमीज में पाठशाला पहुंच ककहरा सीखने वाले दुनिया को कुछ नया सिखाने का माद्दा रखते हैं। इन्हीं में से एक हैं यूपी के सिद्धार्थनगर स्थित डुमरियागंज के मूल निवासी अजय अग्रहरि, जिन्होंने गांव के प्राथमिक विद्यालय से निकलकर विश्व की सबसे बड़ी कांट्रैक्ट रिसर्च आर्गनाइजेशन तक का सफर तय किया। बकौल अजय, 'यह सफर इतना आसान नहीं था। माता-पिता के आशीर्वाद व गुरुजनों ने मार्गदर्शन ने हर चुनौतियों का सामना करने का हौसला दिया। अपने मुल्क से दूर अनजाने देश के रिसर्च आर्गनाइजेशन में बतौर साफ्टवेयर इंजीनियर काम करना चुनौतीपूर्ण है। यहां काफी कुछ सीखने को भी मिल रहा है। वहीं जब भी मौका मिलता अपने आस-पास काम करने वालों को भारतीय परंपरा और संस्कृति से जरूर परिचित कराता हूं।'

बताते हैं योग के फायदे - अजय कहते हैं कि, 'मैं योगा अलायंस अमेरिका से पंजीकृत योगा टीचर भी हूं। योग के फायदे बताने के साथ ही मैं नौकरी के बाद लोगों को निश्शुल्क योग की शिक्षा भी देता हूं।'

हिम्मत से मिलेंगे नए रास्ते- अजय गांव के बच्चों को संदेश देते हुए कहते हैं कि, 'जीवन में कभी भी हिम्मत न हारें। समस्याएं आएंगी और समाप्त भी हो जाएंगी। आप को अपनी मेहनत और ईमानदारी के बल पर निरंतर आगे बढते रहना होगा। निश्चित ही एक दिन जरूर आएगा, जब आप सफलता के नए आयाम गढ़ लेंगे।'

गांव को बच्चों को दिखाएंगे ख्वाब - अजय कहते हैं कि, 'फिलहाल अभी वापस आने का विचार नहीं है। मगर दिली ख्वाहिश है कि काम के बाद वापस अपने गांव जाकर बच्चों को पढ़ाऊंगा। उनको सपने देखने और उन्हें पूरे करने का हौसला दूंगा। कामयाबी के शिखर पर रहते हुए अपने देश, अपनी माटी के लिए समर्पित रहने का जज्बा दूंगा।

परदेश में रहकर भी देशसेवा - 'सिर्फ देश ही नहीं बाहर रहने वाले लाखों लोग किसी न किसी रूप में भारत मां की सेवा कर रहे हैं। 'अजय कहते हैं कि, 'मैं भी वतन से दूर रहकर भारतीय मूल्यों और परंपराओं के वाहक के रूप में कार्य कर रहा हूं।'