शिव की नगरी काशी की प्रातःबेला देवाधिदेव की अभ्यर्थना और मंदिरों में घरी-घंटियों की अनुगूंज ही नहीं, मंत्र-पुष्पों से सुवासित ऐसी अनुभूति है जो व्‍यक्‍ति को समग्र ऊर्जा के उल्लास से भर देती है। भोर जहां लोगों की मंगलकामना में उतरती है और पूरब से फूटी सूरज की किरणें भी लोक कल्याण के लिए काशी विश्वनाथ का अभिषेक कर खुद को धन्य समझती हैं। इन भावों से युक्त सुबह-ए-बनारस-काफी टेबल बुक अति पुराने शहर बनारस की अनूठी जीवन शैली की चित्रमय कथा-कृति है जिसकी चितेरी भाव-भूमि बराबर जाग्रत व जीवंत बनी रहती है।

वैदिक धर्म अध्यात्म और दर्शन की पृष्ठभूमि में काशी की अनोखी जीवन शैली पर केंद्रित सुबह ए बनारस काफी टेबल बुक विभिन्न अध्यायों की कड़ियों से बनारस को बांधने का अभिनव प्रयास है। इन अध्यायों में विशिष्ट ब्रह्मकाल के अंतर्गत काशी के अधिष्ठाता शिव की आराधना और उषाकाल का अद्भुत वर्णन है। ऋग्वेद के उद्धरण के साथ उषाकाल की चर्चा, पंडितराज जगन्नाथ के गंगालहरी की देवी सुरेश्वरी भगवती गंगे सहित देसी- विदेशी कवियों की पंक्तियों में पिरोई गई बनारस की सुबह का रेखांकन मनोहारी चित्र खींचता है।

मनोरम गंगा- में मातृत्व व शील से युक्त मां गंगा का काशी में प्रवेश का विवरण भी स्तुत्य है। अद्वितीय घाट में- आंखों को सम्मोहित करने वाले काशी के अनुपम घाटों की छटा है तो श्रद्धा के स्वरूप में काशी के धर्मावलम्बियों तथा आस्था के विभिन्न रूपों का सजीव वर्णन है। सुबह का आगाज में- बनारस की सुबह का खूबसूरत चित्र खींचते हुए दर्शाया है कि किस तरह यहां सुप्रभातम व अजान का स्वर साथ-साथ गूंजता है। साज ओ रियाज- अध्याय बनारस की भोर में की जाने वाली एक ऐसी कवायद है जो संगीत की स्वर लहरियों से आरंभ होती है। संगीत साधक भोर को ही रियाज की बेला मानते हैं। अपने साज ओ सामान के साथ सुबह-ए-बनारस का हिस्सा बनते हैं।

लजीज नाश्ता भी सुबह-ए-बनारस की अनोखी पहचान है। भोर में ही यहां हलवाइयों के चूल्हे दहक उठते हैं, कड़ाहियां कड़ाहियां खदकने लगती हैं और छनने लगती हैं कचौड़ी-जलेबी। इन पंक्तियों के साथ लजीज नाश्ता अध्याय में इसका खूबसूरत वर्णन है। पान का रिवाज- में बनारस के पान की खूबियां गिनायी गई हैं। बनारस की पुरपेंच गलियों को बनारस की धमनियों से जोड़ते हुए नजीर बनारसी की इन पंक्तियों से नवाजा गया है- ‘ऐसा भी है बाजार बनारस की गली में, बिक जाए खरीदार बनारस की गली में।‘
इसी तरह बनारस की सतरंगी कलाएं-अध्याय में यहां से जन्म लेने वाली कलाओं का जिक्र है। बनारस के लोग कितने गुनी होते हैं इसका बेहतर रेखांकन है। पीतल के बर्तन,नक्काशी, लकड़ी-मिट्टी के खिलौने,पुआल व पत्थर की प्रतिमाएं, हाथी दांत से बनी चीजें, मीनाकारी, सिल्क, कतान, कढाई, साडी व कालीन की कारीगरी की चर्चा की गई है। वैविध्यता-के अंतर्गत यहां के जनजीवन में विविधता के समावेश का अद्भुत चित्रण है। अनूठे रोजगार अध्याय में सुबह सुबह कौन कौन लोग, किस तरह के रोजगार से जुड जाते हैं इसकी व्याख्या भी अत्यंत रोचक है। मसलन-जितना ही विविधताओं और विचित्रताओं से भरा बनारस है उतनी ही विविधताओं से भरे रोजगार और जीवनयापन के साधन हैं। डोलची में आरती और कटोरी में भस्म, रोरी चंदन से लोगों का माथा टीकना..और गृहस्थी की गाडी सरक जाती है।

आरंभ में नमामि गंगा में सुबह ए बनारस ही क्यों का औचित्य स्पष्ट करते हुए काशी के महात्म्य और जीवन शैली की विशद व्याख्या की गई है। सुबह ए बनारस का सार तत्व प्रमाणित करती हैं ये पंक्तियां --सुबह ए बनारस की छटा शाश्वत सत्य व सनातन है। अगम्य, अछोर, अमेच्छु, असीम और अनंत है। इसे न कोई शिल्पी उकेर सकता है न चितेरा चित्रित कर सकता है और न कोई कलाकार संयोजित कर सकता है। इसकी अनिवर्चनीय और अलौकिक सौंदर्य राशि प्रणम्य है।
लगभग तीन सौ पेज की सुबह ए बनारस काफी बुक का आवरण अत्यंत आकर्षक है। भाषा सहज व सुगम्य है। सभी अध्यायों से जुडे अनेक विषयगत चित्र हैं। चित्रों की खूबी है कि वे आंखों को सुख और मन को पुण्यलाभ देने वाले जीवंत चित्र हैं। पं. धर्मशील चतुर्वेदी के आलेखों को अतुल दुबे, अभिषेक सिंह और राहुल सिंह के कैमरे ने संवारा है। क्षितिज राय का कला निर्देशन,फ्रांसीना रुआना की ग्राफिक डिजाइन व मून लाइट पिक्चर्स के रचनात्मक सृजन को जागरण प्रकाशन ने आकार दिया है।

Posted By: Monika Minal

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