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GEN-Z के दिल्ली के जंतर-मंतर और रांची के छात्र आंदोलन का अलग नेचर : शिवप्रताप शुक्ल

By Shivanand Rai Edited By: Abhishek sharma
Published: Sat, 26 Sep 2026 05:13 PM (IST)

तेलंगाना के राज्यपाल शिवप्रताप शुक्ल ने वाराणसी में कहा कि 2047 के विकसित भारत का संकल्प युवा शक्ति ही पूरा ...और पढ़ें

भारतीय ज्ञान परंपरा और नई पीढ़ी: शिवप्रताप शुक्ल ने युवाओं को दिया विकसित भारत का मंत्र।

भारतीय ज्ञान परंपरा और नई पीढ़ी: शिवप्रताप शुक्ल ने युवाओं को दिया विकसित भारत का मंत्र।

HighLights

  1. युवा शक्ति 2047 के विकसित भारत का संकल्प पूरा करेगी।

  2. विवेक, धैर्य और भारतीय ज्ञान परंपरा का पालन है आवश्यक।

  3. युवा रोजगार देने वाले बनें, कौशल और अनुशासन अपनाएं।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। स्मार्टफोन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दौर में सूचनाएं तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन विवेक, धैर्य और सही-गलत की पहचान की क्षमता विकसित करना भी जरूरी है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी और दूसरों को सुनने की संस्कृति होनी चाहिए। प्रश्न करना, तर्क करना और अनुभव से जोड़ना हमारी ज्ञान परंपरा का आधार रहा है।

विज्ञान के साथ विवेक, तकनीक के साथ नैतिकता और नवाचार के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व जरूरी है। 2047 के विकसित भारत का संकल्प युवा शक्ति ही पूरा करेगी। ये बातें तेलंगाना के राज्यपाल शिवप्रताप शुक्ल ने कही।

वे शनिवार को सनबीम वरुणा के सभागार में दैनिक जागरण के तत्वावधान में पूर्व संपादक नरेंद्र मोहन की जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित ‘भारतीय ज्ञान परंपरा और नई पीढ़ी : शिक्षा, संस्कार और भविष्य’ विषयक संगोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे। युवाओं को रोजगार पाने की बजाय रोजगार देने वाला बनने का आह्वान करते हुए उन्होंने कौशल और अनुशासन पर बल दिया।

उन्होंने कहा कि भारत केवल भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से विकसित जीवन दृष्टि और सभ्यता है। भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि व्यक्ति को विवेकशील, जिम्मेदार और संवेदनशील बनाना रहा है।

‘सा विद्या या विमुक्तये’ का भाव अज्ञान, भय और संकीर्णता से मुक्ति का मार्ग दिखाता है। कहा कि संविधान में केवल अधिकारों की नहीं, कर्तव्यों की बात भी लिखी है। अपने अधिकार मांगते समय और संविधान की किताब दिखाते समय यह भी सोचना चाहिए कि हमने देश के लिए क्या किया है।

कहा कि जहां नेपाल में जेन-जी युवाओं ने विध्वंस किया, वहीं कुल्लू दशहरा में भारत के युवा रथ खींचने में जुटते हैं। युवाओं को संस्कृति सिखाने की आवश्यकता है, न कि विदेशी प्रभाव में संस्कृति को नष्ट करने वाले संदेश देने की। आधुनिकता और भारतीयता में कोई विरोध नहीं। दिल्ली के जंतर-मंतर और रांची के अहिंसक छात्र आंदोलन की तुलना करते हुए कहा कि युवाओं को हिंसा नहीं, धैर्य और अनुशासन का पाठ सीखना चाहिए, जो रांची में दिखा।

प्रकृति के प्रति सम्मान और आत्म-अनुशासन भारतीय चिंतन का मूल है। दैनिक जागरण के पूर्व प्रधान संपादक स्वर्गीय नरेंद्र मोहन को श्रद्धांजलि देते हुए उन्होंने कहा कि वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। पत्रकारिता में स्वतंत्रता के साथ अनुशासन भी आवश्यक है।

सारस्वत अतिथि उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के पूर्व सदस्य पद्मभूषण प्रो. देवी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने की आवश्यकता है। केवल डिग्री हासिल करना शिक्षा नहीं है, बल्कि ज्ञान और संस्कार ही सच्ची शिक्षा का आधार हैं। शिक्षा केवल नौकरी दिला सकती है, लेकिन ज्ञान का उद्देश्य जीवन को सही दिशा देना है। भारतीय परंपरा में अक्षर बोध प्रतीकों के माध्यम से कराया जाता है, जो तार्किक और व्यावहारिक महत्व रखता है। यदि हम भारतीय ज्ञान परंपरा के अनुसार जीवन चलाएंगे तो भविष्य निश्चित रूप से मंगलमय होगा।

विशिष्ट अतिथि काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा की निरंतरता बनाए रखने के लिए युवा पीढ़ी के साथ गहन और द्विमार्गी संवाद बेहद आवश्यक है। परंपरा और आधुनिकता के बीच का द्वंद्व हर समाज में चलता रहता है, लेकिन संवाद के अभाव में भ्रम और दूरी बढ़ जाती है।

कहा कि स्व. नरेंद्र मोहन की जयंती 10 अक्टूबर को है, लेकिन उससे पहले पूरे देश में जहां-जहां दैनिक जागरण है, वहां इस तरह के कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। उनकी स्मृति में दिए छात्रवृत्तियां व साहित्यिक सम्मान देकर जागरण परिवार अपने पूर्व प्रधान संपादककी साहित्य और संस्कृति के प्रति उनकी निष्ठा का सच्चा सम्मान कर रहा है।

सम्मानित अतिथि संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा मनुर्भव यानी मनुष्य बनने का उद्घोष करती है। धर्म को धारण करने का संदेश देती है। धर्म, सांप्रदायिकता नहीं है बल्कि मनुष्य होने के दस लक्षणों, धैर्य, क्षमा, संयम, अस्तेय, शौच, इंद्रिय निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य, अक्रोध का वर्णन करते हुए कहा हमारी ज्ञान परंपरा में ये मनुष्यता का पाठ पढ़ाने वाले ये लक्षण शाश्वत हैं, इसीलिए इसे सनातन कहा जाता है।

धैर्य की असली कसौटी विपत्ति में भी कर्तव्यपथ पर अडिग रहना है। भगवान राम विपत्ति और राजगद्दी दोनों में एक-से रहे। क्षमा उसी को शोभा देती है जिसके पास दंड देने का सामर्थ्य हो। 2047 के विकसित भारत का लक्ष्य तभी पूरा होगा जब भारत की संतति भारतीय बने, स्वाभिमान जगाए और विकास की पहली किरण अंतिम व्यक्ति की झोपड़ी तक पहुंचे।

विशिष्ट अतिथि पद्मश्री राजेश्वर आचार्य ने कहा कि हमारी ज्ञान-परंपरा की महिमा इतनी व्यापक है कि मिट्टी से हिरण्य और फिर चिन (चेतना) की ओर प्रस्थान करना सिखाती है। नरेंद्र मोहन जी ने देवेंद्र बनने की इच्छा नहीं की। वे नर से नरेंद्र बनने की प्रक्रिया में जन-जन को पढ़ाते रहे और तत्व को मानवता के रूप में आगे बढ़ाया। इसलिए उनका व्यक्तित्व वाणी और करणी दोनों से स्मरणीय है।

आरंभ में सभी अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। दैनिक जागरण के संपादक मिश्र ने विषय प्रस्तावना रखते हुए सभी अतिथियाे का स्वागत किया, संचालन डा. आकृति विज्ञा अर्पण ने किया। इस अवसर पर सभागार शहर के तमाम प्रबुद्ध वर्ग के लोगों से भरा रहा।