वाराणसी : भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष द्वितीया की रात जैसे -जैसे परवान चढ़ती गई, चिरयुवा शहर बनारस 'कजरी' के 'सुर सागर' में डूबता -उतराता चला गया। चासनी से तर-बतर जलेबे के स्वाद ने मिजाज बनाया। मस्ती का रंग छाया और झूले पर पींगें देते सुर -राग से बाग-बाग हो झूमता गया। सिर्फ और सिर्फ महिलाओं के लिए आरक्षित बनारस के खांटी लोक पर्व कजरी तीज पर कालोनियों में भले इसका रंग फीका रहा लेकिन पुराने मोहल्लों ने काशी को उसके अतीत की भूली-बिसरी यादों से एक बार फिर रूबरू कराया।

नगर के पुराने टोले -मोहल्लों या कुछ गांवों ने मंगलवार को 'रतजगे' के जोशीले आयोजनों के जरिए बिसरते पर्व को जिलाए रखने का अपने - अपने स्तर पर जतन किया। पांडेयपुर, तेलियाबाग, चेतगंज, दारानगर, जैतपुरा, कबीरचौरा, मुकीमगंज, विश्वेश्वरगंज, मछोदरी, सोनारपुरा, खोजवा समेत नगर के पक्के महाल की गलियां और खासकर कामगारों व निम्न मध्यमवर्गीय बस्तियों में इस लोक पर्व की धूम रही। कुछ घंटों के लिए ही सही लोगों ने दुनियावी दुश्वारियों को दरकिनार कर दोनों बाहों से लोक पर्व की खुशियां बटोरीं। रात के दूसरे पहर से ही महिलाओं की टोलियां नजदीकी मंदिरों और अन्य उत्सवी ठीहों पर जुटने लगीं और झूले ¨हडोल लेने लगे। कुछ ही देर में गलियां 'कइसे खेले जाइं सावन में कजरिया, बदरिया घेरि आई सखिया..', 'बरसे सावन रसधार हो, सवनवा में अइलें बलमू..', 'हरे रामा कृष्ण बने मनिहारिन, पहिन लीन्ही सारे ए हरि..' समेत तमात रसभीने गीतों से गूंज उठीं। झूलों की उड़ान, गरमागरम जलेबों के जलपान और सामूहिक लोकगान से सजा 'रतभर्रा' उत्सव रात के तीसरे पहर तक परवान चढ़ता नजर आया। मिठाई की दुकान से जुड़ी पर्व की पहचान - बिसरते पर्व को पहचान दिलाने में उन मिठाईवालों की भूमिका भी उल्लेखनीय रही जिन्होंने दोपहर बाद से ही रसभरे जलेबों की 'घान' उतार कर 'खमीरी सुगंध' का ऐसा जादू जगाया कि लोग बिन बताए ही जान गए कि आज की रात कजरी की रात है। बंदनवारों से सजी इन दुकानों पर धागों से लटके जलेबे के बड़े-बड़े रस टपकाते छत्ते बरबस ही लोगों के कदम रोकते रहे। उत्सव में सबकी भागीदारी भले संभव न हो पाई हो लेकिन इन जलेबों ने अपने स्वाद से सबको एक सूत्र में बांधने में अहम् भूमिका निभाई। आज सजेगी कान पर 'जरई' - बिसरती परंपराओं की सूची में शुमार जरई का त्योहार बुधवार को मनाया जाएगा। रस्म अनुसार किशोरियां-युवतियां जतन से रोपे गए 'जौ' की कनियों का गुच्छा भाइयों के कान पर सजाकर उनके दीर्घायुष्य और मंगल-कल्याण कामना करती हैं। कई स्थानों पर भाइयों संग पिता व अन्य संरक्षकों को भी जरई सजाने का चलन है।

Posted By: Jagran

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