वाराणसी [शैलेश अस्थाना]। काशी में गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) बीएचयू आगे आया है। योजना है कि गंगा में चलने वाली नावों को सौर ऊर्जा युक्त कर दिया जाए। इससे नाविकों को ईंधन में होने वाले खर्च से छुटकारा मिलेगा, साथ ही पेट्रो उत्पादों के धुएं से होने वाले प्रदूषण से जल, वायुमंडल और जलीय जंतुओं को राहत मिलेगी। विज्ञानियों ने एक नाव में सौर ऊर्जा संग्रहण के लिए लीथियम आयन बैटरी का उपयोग किया है। इसे एक माह से परीक्षण के तौर पर चलाया जा रहा है। सोलर पैनल, बैटरी, नौका की डिजाइन, उसकी गति, हवा की गति, लहरों का वेग आदि सभी दृष्टिकोण से संभावित समस्याओं का अध्ययन किया जा रहा है, ताकि इसे सुधारा जा सके।

पीएम ने पांच साल पहले की थी कोशिश : गंगा में चलने वाली नावें पहले चप्पू से चलती थीं। बाद में इनकी जगह डीजल चालित मोटर ने ले ली। प्रधानमंत्री बनने के बाद बनारस के सांसद नरेन्द्र मोदी ने नाविकों को बैटरी चालित नाव उपलब्ध कराकर गंगा को प्रदूषण से बचाने का सपना देखा। उन्होंने 2016 में ट्रायल के तौर पर 11 नाविकों को चार-चार लेड-आयन बैटरी और मोटर उपलब्ध कराई। समस्या यह थी कि लेड आयन बैटरी बहुत वजनी थी। चार्ज करने के लिए नाविकों को उसे ढोकर घर लेना जाना पड़ता था। इस परेशानी को देखते हुए सीएनजी से नाव चलाने की योजना बनाई गई। अब अधिकांश नावें सीएनजी हो चुकी हैं। इनकी रीफिलिंग के लिए गंगा में फ्लोटिंग फिलिंग स्टेशन स्थापित किया गया है और दूसरा तैयार होने वाला है।

आइआइटी ने दिक्कतों को समझा: ऊर्जा एवं पर्यावरण संरक्षण के प्रति प्रधानमंत्री का आग्रह देख आइआइटी बीएचयू ने इस दिशा में कुछ करने का बीड़ा उठाया। संस्थान के निदेशक प्रो. पीके जैन ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग के इंजीनियरों व प्राध्यापकों से बातचीत की। इसके बाद प्रो. संदीप घोष, प्रो. श्याम कमल, डा. स्वामी नायडू, शोध छात्र शिव प्रकाश और इनकी टीम ने सौर ऊर्जा से नाव को चलाने की दिशा में सोचना शुरू किया। इसकी डिजाइन तैयार की। प्रयोग के लिए वीरेंद्र निषाद की नाव को लिया। उसकी छत पर एक किलोवाट का सोलर पैनल तथा 24 वोल्ट, 100 एमएएच की लीथियम आयन बैटरी तथा एक अश्वशक्ति की मोटर लगाई गई। कई दौर के सुधार के बाद परीक्षण सफल रहा। बैटरी सात-आठ घंटे में फुल चार्ज होकर तीन घंटे और 15 किलोमीटर का बैकअप दे रही है। गति लगभग आठ किमी प्रति घंटा रहती है। नाव में एक डेटालागर भी लगाया गया है, ताकि संचालन संबंधी सभी आंकड़े उसमें स्वत: फीड हो जाएं। इससे आने वाली समस्याओं को सुलझाने में मदद मिलेगी। अभी इसकी लागत करीब डेढ़ लाख रुपये है। प्रो. घोष ने बताया कि हम इसकी लागत कम करने, बैटरी व मोटर की क्षमता तथा नाव की गति को बढ़ाने के उपायों पर काम कर रहे हैं। इसके बाद मां गंगा को गैसीय प्रदूषण से मुक्त करने की दिशा में बड़ा सार्थक प्रयास सामने आएगा। 

नाव चलते समय चार्ज होती है बैटरी: नाविक वीरेंद्र निषाद पूर्व में लेड आयन बैटरी वाली नाव चला चुके हैं। वह बताते हैं कि उस बैटरी को चार्ज करने के लिए घर ले जाना पड़ता था। अब नाव चलती रहती है, बैटरी चार्ज होती रहती है। शाम हो जाने के बाद समस्या आती है। आइआइटी के विज्ञानी इस पर काम कर रहे हैं। बैटरी और बेहतर बन जाएगी तो शाम ढलने के बाद भी देर तक काम करेगी।

आइआइटी के पूर्व छात्र ने किया सहयोग: नाव के लिए पानी में भी काम करने वाली विशेष प्रकार की हल्की स्वदेशी लीथियम बैटरी बनाने की जिम्मेदारी उठाई नई दिल्ली के उद्यमी और आइआइटी बीएचयू के पूर्व छात्र राहुल राज ने। इन्वर्टेड एनर्जी नाम से कंपनी चला रहे राहुल और उनकी टीम ने विशेष बैटरी बनाकर संस्थान को उपलब्ध कराई है। राहुल कहते हैैं, मैैंने बनारस में आइआइटी बीएचयू में पढ़ाई की, पटना का रहने वाला हूं। इसलिए मां गंगा से लगाव स्वाभाविक है। सक्षम व बेहतर बैटरी विकसित करने के लिए इलेक्ट्रानिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय 1.20 करोड़ की मदद देगा जबकि 35.80 लाख रुपये कंपनी खर्च करेगी।

बोले आइआइटी निदेशक : हम विश्व के सबसे प्राचीन और पवित्र शहर वाराणसी में रह रहे हैं। हमारा दायित्व है कि मां गंगा को प्रदूषण से बचाने और यहां के लोगों का जीवन स्तर उठाने के लिए हर संभव प्रयास करें। काशी की संस्कृति और विरासत के संरक्षण व विकास की योजनाओं पर भी काम चल रहा है। -प्रो. पीके जैन, निदेशक, आइआइटी बीएचयू।

Edited By: Abhishek Sharma