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काशी की रक्षक हैं चौसठ्ठी देवी, शिव की जटा से प्रकट हुईं 64 योगिनियां, 500 साल पुराना है सिद्धपीठ

By Pradyuman Pandey RamuEdited By: Abhishek sharma
Published: Wed, 14 Oct 2026 05:06 PM (IST)

काशी का चौसट्ठी देवी मंदिर सबसे प्राचीन सिद्धपीठों में से एक है, जहां शिव की जटा से प्रकट 64 योगिनियों ...और पढ़ें

काशी की रक्षक चौसट्ठी देवी शिव की जटा से प्रकट 64 योगिनियों का 500 साल पुराना सिद्धपीठ।

काशी की रक्षक चौसट्ठी देवी शिव की जटा से प्रकट 64 योगिनियों का 500 साल पुराना सिद्धपीठ।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। काशी में गंगा किनारे स्थित चौसट्ठी देवी मंदिर काशी के सबसे प्राचीन सिद्धपीठों में से एक है, मोहल्ले का नाम भी इसी मंदिर के नाम पर चौसठ्ठी घाट पड़ा, मंदिर के पुजारी चुन्नीलाल पंड्या बताते हैं कि उनके पूर्वज गुजरात से आकर यहां सेवा करने लगे।

बताते हैं क‍ि मंदिर की कथा काशी पुराण में वर्णित है, मान्यता है कि सती के देह त्याग के बाद शिव विक्षिप्त हो गए, उन्हें शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने चक्र से सती के अंगों का विभाजन किया। उनके कई स्‍थानों पर कई जगहों पर अंग काशी में गिरे।

एक अंग मणिकर्णिका पर गिरा जहां विशालाक्षी देवी विराजमान हैं, वहीं क्रोध में शिव ने जब अपनी जटा खोली तो उससे 64 योगिनियां प्रकट हुईं, ये राक्षसों के संहार के लिए प्रकट हुईं और दुर्गा का ही रूप हैं, इन 64 योगिनियों की प्रधान अधिष्ठात्री देवी ही चौसठ्ठी देवी हैं।

मंदिर का वर्तमान स्वरूप करीब 500 साल पुराना है, कलकत्ता के जमींदार कवींद्र नारायण को स्वप्न आया कि काशी के जंगल में देवी की मूर्ति है, मंदिर बनवाओ, उन्होंने यहां भद्रकाली की मूर्ति स्थापित कर मंदिर का निर्माण कराया।

बताते हैं क‍ि यह वही स्थान है जहां चौसठ योगिनियां वृक्ष पर विराजमान थीं, यह सिद्धपीठ है, क्रिया योग के ज्ञाता श्यामाचरण लाहिड़ी, प्रसिद्ध तांत्रिक देवरहा बाबा और डॉ. श्रीमाली जैसे साधकों ने यहां साधना की है,

होली पर लगता है लाखों का जमावड़ा

मंदिर का मुख्य पर्व होली है। पुजारी बताते हैं कि जिस दिन काशी में होलिका दहन होता है, यहां हवन के रूप में अग्नि जलती है, दूसरे दिन काशी के लाखों हिंदू नया वस्त्र पहनकर अबीर-गुलाल खेलते हुए दर्शन को आते हैं, मान्यता है कि इस दिन दर्शन से पुरुषों को भूत-प्रेत बाधा और स्त्रियों को गर्भ बाधा से एक वर्ष तक मुक्ति मिलती है।

नवरात्र में नौ दिन माँ के अलग - अलग नौ स्वरूप के मुखौटे लगाकर देवी के नौ रूपों के दर्शन कराए जाते हैं, यह मंदिर सुबह साढ़े पांच से छह बजे खुल जाता है, विशेष भोग में हलवा, पूरी, सब्जी, खीर, फल और रोज नारियल चढ़ता है।