सिंधी डायस्पोरा के पूरे विश्व मे फैले हुए लोग, पर सभी का डीएनए एक, 5000 साल पुरानी सिंधु घाटी से जुड़ी विरासत
सिंधी डायस्पोरा पर हुए एक शोध के अनुसार, दुनिया भर में फैले सिंधियों का डीएनए एक समान है और यह ...और पढ़ें

सिंधी समुदाय का डीएनए रहस्य खुला 5000 साल पुरानी सिंधु घाटी विरासत।
HighLights
विश्व भर में फैले सिंधियों का डीएनए एक समान।
डीएनए 5000 साल पुरानी सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ा।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने किया महत्वपूर्ण शोध।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। सिंधी डायस्पोरा से जुड़े एक शोध ने चौंकाने वाला दावा किया है। इसके अनुसार पूरे विश्व में फैले हुए लोगों का डीएनए एक है और सभी 5000 साल पुरानी सिंधु घाटी से जुड़ी विरासत के अंग भी रहे हैं।
दुनिया में कुछ समुदाय ऐसे हैं जो सदियों पहले अपनी भूमि से बिखर गए, लेकिन आज भी उनका डीएनए उन्हें एक सूत्र में बांधे हुए है। यहूदी समुदाय इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। पूरी दुनिया में फैले यहूदी आज भी अपने प्राचीन डीएनए को पहचानते हैं। ठीक ऐसी ही कहानी सिंधी समुदाय की भी है।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ज्ञान लैब की वैज्ञानिक चंचल देवनानी, जीन विज्ञानी प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने गुजरात विश्वविद्यालय के डॉ खुसबू गौतम और प्रोफेसर राकेश रावल के साथ मिलकर 113 सिंधियों के डीएनए की गहराई से जांच की। नतीजा बेहद महत्वपूर्ण है, भारत और पाकिस्तान में बसे सिंधी समुदाय न केवल सांस्कृतिक और भाषाई रूप से, बल्कि अपने जीनोम में भी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। उनकी साझा विरासत प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता तक जाती है।
वैज्ञानिक भाषा में इसे सिंधी डायस्पोरा कहते हैं, यानी एक ऐसा समुदाय जो अपनी मूल भूमि से बिखरकर दुनिया भर में फैल गया, फिर भी अपनी आनुवंशिक पहचान को बचाए रखा। यह शोध आज विज्ञान की अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ह्यूमन जेनेटिक्स में प्रकाशित हुई।
सिंधु घाटी सभ्यता के काल में सिंध क्षेत्र में एक जातीय समूह फला-फूला, जिसे आज भी सिंधी के नाम से जाना जाता है। यह समुदाय सिंधु नदी के तट पर विकसित हुआ। इसकी सभ्यता और संस्कृति सिंधु घाटी सभ्यता जितनी ही प्राचीन हैं।
इस सांस्कृतिक निरंतरता का सबसे जीवंत प्रमाण अज्रक है। अज्रक एक विशेष प्रकार का पारंपरिक ब्लॉक-प्रिंट वाला सूती कपड़ा है, जो सिंधी पहचान, सम्मान और आतिथ्य का प्रतीक है। हड़प्पा और मोहनजो-दरो की खुदाई में मिली पुरोहित राजा की मूर्ति के कंधे पर लिपटी शॉल पर वही त्रिफोली पैटर्न दिखता है, जो आज के अज्रक में भी देखने को मिलता है। यानी न सिर्फ डीएनए, बल्कि पहनावा भी 5000 साल पुरानी विरासत को आज तक संजोए हुए है।
1947 में भारत के विभाजन के बाद सिंध प्रांत पाकिस्तान का हिस्सा बन गया। इसके बाद बड़ी संख्या में सिंधी हिंदू और सिख अपना घर-बार छोड़कर भारत के विभिन्न हिस्सों विशेषकर गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली में आकर बस गए।
इसके बावजूद, सिंधी डायस्पोरा पर अब तक कोई व्यापक जीनोम-वाइड अध्ययन नहीं हुआ था। पहली बार काशी हिंदू विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने गुजरात विश्वविद्यालय के साथ मिलकर सात लाख तीस हजार डीएनए मार्कर्स का अध्ययन 113 सिंधी व्यक्तियों पर किया और इसकी तुलना दो हजार लोगों से की।
शोध की प्रथम लेखिका चंचल देवनानी ने कहा कि इस महत्वपूर्ण अध्ययन ने साबित कर दिया कि भारत और पाकिस्तान में बसे सिंधी समुदाय अपने जीनोम में भी एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।
वैज्ञानिकों ने जब आधुनिक सिंधियों के डीएनए को प्राचीन नमूनों से मिलाया, तो पाया कि उनके डीएनए का 60 से 66 प्रतिशत हिस्सा प्राचीन सिंधु घाटी क्षेत्र के लोगों से आता है। यह मिश्रण लगभग 2500 से 2900 वर्ष पहले हुआ था। यानी आज से करीब ढाई हजार साल पहले भी सिंधु क्षेत्र के लोग अपनी अलग पहचान बना चुके थे। आज के सिंधी चाहे वे विश्व के किसी कोने में रहते हों, उसी प्राचीन डीएनए को अपने अंदर लिए घूम रहे हैं।
राज्यवार विश्लेषण (राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, तेलंगाना) में भी यही पैटर्न लगभग एक समान रहा। यानी विभाजन के बाद भारत में फैले सिंधियों में भी मूल आनुवंशिक संरचना बनी रही। दोनों समूहों में सबसे उल्लेखनीय अंतर इनब्रीडिंग (सजातीय विवाह) के स्तर पर देखा गया। पाकिस्तानी सिंधियों में एक जैसे डीएनए खंडों की संख्या और लंबाई काफी ज्यादा थी। इसका मुख्य कारण वहाँ रिश्तेदारों में शादी-ब्याह की परंपरा का अधिक प्रचलन है।
इसके विपरीत, भारतीय सिंधियों में इनब्रीडिंग का स्तर काफी कम था। बंटवारे के बाद वे अलग-अलग राज्यों में फैल गए और सिंधी के विभिन्न समुदायों से विवाह किए, जिससे उनका डीएनए थोड़ा अधिक विविध हो गया।
प्रमुख जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा, "सिंधी समुदाय यहूदियों की तरह एक डायस्पोरा है। बंटवारे ने उन्हें कई देशों में बांट दिया, लेकिन उनका डीएनए आज भी 5000 साल पुरानी सिंधु घाटी से जुड़ा हुआ है। विभिन्न जगहों पर जाने के बाद भी यह उनके साझा विरासत की सबसे बड़ी मिसाल है।"
