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भगवान श‍िव ने बनाया जहां घर वहां पर इस बरस करीब 180 बुजुर्ग म‍िले बेघर, परिवार के लिए कभी थे सहारा फ‍िर सबने काटा किनारा

By Shivam SinghEdited By: Abhishek sharma
Published: Wed, 30 Sep 2026 05:12 PM (IST)

अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस पर वाराणसी में बुजुर्गों की दयनीय स्थिति सामने आई है, जहाँ परिवार के सहारे रहे कई बुजुर्ग ...और पढ़ें

वाराणसी में वृद्धजन दिवस पर बेघर हुए बुजुर्गों की दर्दनाक कहानी।

वाराणसी में वृद्धजन दिवस पर बेघर हुए बुजुर्गों की दर्दनाक कहानी।

HighLights

  1. वाराणसी में अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस पर बुजुर्गों की दयनीय स्थिति।

  2. परिवार द्वारा त्यागे गए बुजुर्ग लावारिस जीवन जीने को मजबूर।

  3. समाज को बुजुर्गों के प्रति संवेदनशीलता पर आत्ममंथन की आवश्यकता।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। एक अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस मनाया जा रहा है, लेकिन वाराणसी में उम्र के अंतिम पड़ाव पर पहुंचे बुजुर्गों की स्थिति समाज के लिए गहरी चिंता का विषय बनी हुई है। स्वजन के लिए जीवनभर सहारा बने ये बुजुर्ग अब अंतिम समय में परिवार से किनारा काटे जाने की पीड़ा झेल रहे हैं। सेवा की जगह कई घरों में रिश्ते दागदार हो रहे हैं और बुजुर्गों को लावारिस हालत में अस्पताल छोड़कर मुक्ति पाने की प्रवृत्ति बढ़ती दिख रही है।

मोतीझील के लावारिस दिव्यांग मरीज श्यामल दत्त की कहानी इस पीड़ा को जीवंत कर देती है। वे बताते हैं कि सिगरा पानी टंकी के पास सालों से रह रहे हैं। आसपास के 10-12 घर वाले कभी-कभी खाना-पीना दे देते हैं। बेहोशी की हालत में कुछ लोगों ने उन्हें मंडलीय चिकित्सालय में भर्ती करा दिया। श्यामल दत्त के अनुसार उनका एक बेटा रंजन दत्त और बेटी मिली दत्त हैं।

बहू की वजह से घर-द्वार बनाकर किसी को रखा था, लेकिन वह भी लापता हो गया। इसी कारण बेटा नाराज हो गया। वे याद करते हैं कि ट्राली चलाकर लड़के के लिए एलआईसी पालिसी, अंगूठी दी और शादी-विवाह भी कराया। अब पोखरे के पास कभी-कभी बेटा मिलने आ जाता है, लेकिन नियमित सहारा नहीं मिल पाता। काशी में भगवान श‍िव ने अपना घर बनाया और पर‍िवार सह‍ित वह काशी में व‍िराजे लेकिन काशी में ही दरकते र‍िश्‍ते पर‍िवारों की दुखद कहानी कह रहे हैं। 

इसी तरह उमरहा के शिव प्रकाश मिश्रा की स्थिति भी दर्दनाक है। वे बताते हैं कि उनका एक लड़का है जो दिव्यांग है। भाई-भतीजा सहित स्वजन मौजूद हैं, लेकिन अब घर वालों से संपर्क करना मुश्किल हो गया है। वे बनारस के बेनियाबाग में मजदूरी करते थे। उम्र बढ़ने और स्वास्थ्य बिगड़ने के साथ परिवार से दूरी बढ़ती गई और वे भी लावारिस जैसे हालात में पहुंच गए।

ये कहानियां सिर्फ दो उदाहरण हैं। शहर के कई अस्पतालों और सार्वजनिक स्थानों पर ऐसे बुजुर्ग दिख जाते हैं जिन्हें परिवार ने किसी न किसी बहाने छोड़ दिया है। कभी आर्थिक बोझ का हवाला दिया जाता है, कभी बहु-बेटे के झगड़े का, कभी बीमारी का। नतीजा यह होता है कि बुजुर्ग अस्पताल के बेड पर तड़पते हैं या फिर समाजसेवी संस्थाओं के भरोसे रह जाते हैं।

उम्र के अंतिम पड़ाव पर सम्मान और सेवा हर बुजुर्ग का अधिकार

वाराणसी जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक शहर में जहां गंगा किनारे अंतिम संस्कार की परंपरा है, वहां अपने बुजुर्गों को अंतिम समय में अकेला छोड़ देना विडंबना ही है। अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस इस बात की याद दिलाता है कि उम्र के अंतिम पड़ाव पर सम्मान और सेवा हर बुजुर्ग का अधिकार है। समाज को अब आत्ममंथन करने की जरूरत है कि क्या हम वाकई अपने बुजुर्गों के प्रति उतने संवेदनशील हैं जितना दावा करते हैं।

 

जनवरी से अब तक करीब 180 बुजुर्गों को लावारिस हालत में भर्ती कर इलाज किया जा चुका है। वर्तमान में वार्ड नंबर सात में आठ, वार्ड नंबर छह में दो, वार्ड नंबर पांच में चार, वार्ड नंबर एक में पांच, वार्ड नंबर दो में एक और वार्ड नंबर चार में एक बुजुर्ग भर्ती हैं। दो साल के अंदर ही अब तक 300 से अधिक ऐसे बुजुर्गों को इलाज के बाद वृद्धाश्रम पहुंचाया जा चुका है। कई मामलों में जब लावारिस रूप से मौत हो जाती है तो परिवार की जगह समाजसेवी ही चिता को मुख्य अग्नि देते हैं। यह दृश्य शहर की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करता है।

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डा. बृजेश कुमार, प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक, मंडलीय चिकित्सालय कबीरचौरा