वाराणसी, कुमार अजय। लंका पर रण अभियान के निमित्त सेतु बंधन से पूर्व श्रीराम ने अपने आराध्य भगवान शिव को रामेश्वर लिंग के रूप में पूजा यह कथा सर्वविदित है। इस अनुष्ठान के जरिए रघुकुल तिलक ने खुद तो नवीन ऊर्जा पाई ही यह अभिष्ट भी स्पष्ट है कि इस मौके पर (शिवद्रोही ममभगत कहावा, सो नर मोहि सपनेउ नहीं भावा) जैसी सपाट बयानी से उन्होंने (उत्तर भारत वैष्णव व दक्षिण भारत शैव) के मतैक्य की निरझर धारा भी बहाई। अलबत्ता यह तथ्य प्राय: अगम रहा है कि (जाके प्रिय न राम वैदेही, तजिए ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि परम सनेही) जैसी स्पष्टोक्ति के साथ भगवान शिव ने भी अपनी राजधानी काशी पुरी में अनुजों सहित श्रीराम व उनके परम सेवक हनुमंत लला को शिवलिंग के रूप में स्वयं के साथ एकाकार किया। रामेश्वरम स्थापना के आभार को बड़ी श्रद्धा से स्वीकार किया। अपने ईष्ट रघुनंदन को अपने सानिध्य में ही पूजवाया। सनातन धर्म ग्रंथों में पंथिक समरसता का एक और सुनहरा अध्याय जोड़वाया।

नगर की दाक्षिणात्य बस्ती हनुमान घाट को प्राप्त है यह श्रेयस

यह भी उल्लेखनीय है कि श्रीरामेश्वर, भरतेश्वर, लक्ष्मणेश्वर व शत्रुध्नेश्वर सहित श्री हनुमंतेश्वर के रूप में ये पांचों लिंग रूप काशी केदार खंड स्थित दाक्षिणात्य बस्ती हनुमान घाट में ही विराजते हैं। इस पावन क्षेत्र की महत्ता आभामंडित करते हैं पौराणिक आख्यानों से सजे पृष्ठों वाले काशी खंड को प्रमाणों से साजते हैं। कला साधना की दक्षता के साथ ही काशी के पौराणिक रहस्यों के जानकार डा. राधाकृष्ण गणेशन श्रावण के प्रथम सोमवार को पूरा समय देकर जागरण प्रतिनिधि को क्षेत्र में अलग-अलग स्थित इन पांचों देवायत्नों की परिक्रमा कराई और इनकी महत्ता भी बताई।

श्रीरामेश्वर शिवलिंग

इन लिंगों में प्रथम पुज्य श्री रामेश्वर शिवलिंग वर्तमान में हनुमान घाट मोहल्ले के प्राचीन बड़े हनुमान जी मंदिर परिसर में ही पूजित है। मान्यता है कि इनके दर्शन मात्र से समस्त भव बाधाएं स्वयमेव शमित हो जाती हैँं।

श्रीभरतेश्वर शिवलिंग

भगवान श्रीराम के हृदय में सदैव वास करने वाले भईया भरत फिलहाल मोहल्ले के सुरेश शास्त्री के सहन में लिंग स्वरूप विराजते हैं। श्रुतियों के अनुसार अपनी प्रसिद्धि के अनुरूप ही वें भक्तों के मन में भक्ति के भाव साजते हैं। 

श्रीलक्ष्मणेश्वर शिवलिंग

शिवलिंग के रूप में अपार श्रद्धा प्राप्त कुमार लखन जी बस्ती के प्रसिद्ध योगाचार्य रहे पं. रामा गुरु के आवास के ठीक पार्शव में आसन जमाए हुए हैं। हजारों भक्त शेष स्वरूप की कृपा से ही धैर्य धारण का वरदान पाए हुए हैं।

श्री शत्रुघ्नेश्वर शिवलिंग

प्रशासनिक अनियमितताओं की भेंट चढ़ जाने की वजह से रामपंचायतन के दुलारे शत्रुघ्न लला का शिवलिंग वर्तमान में एक अड़ार की चौहद्दी में चला गया है। गनीमत बस इतनी है कि शिवलिंग को नियमित पूजन अब भी प्राप्त नातों की प्रगाढ़ता को इनके दर्शन का पुण्य प्रतिफल बताया जाता है।

 श्री हनुमंतेश्वर शिवलिंग

भगवान श्री राम के चरणों के एक निष्ट सेवक हनुमान जी महाराज प्राचीन हनुमान घाट पर एक महाकाय शिवलिंग के रूप में पूजे जाते थे। अत्यधिक वजन के चलते आगे चलकर यह शिवलिंग भूमि में धंसता चला गया। वर्तमान में उनका अस्तित्व मात्र एक पलटे हुए तवे के रूप में ही दृष्टव्य रह गया है। इनके निमित्य दर्शन का पुण्यफल संकट हारक बताया जाता है।

ईश्वरत के प्रभुत्व में भी समरसता की सोच

मानस के जानकार आचार्य मुकुंद उपाध्याय का कहना है कि भगवान शिव व विष्णु स्वरूप श्रीराम का एक-दूसरे को अपना आराध्य मानना ईश्वरत के प्रभुता में भी समरस सोच का प्रतिनिधित्व करती है। यह औदार्य सनातन धर्म का संबल है। आदि शंकराचार्य द्वारा देश की चार दिशाओं में चार पीठों की स्थापना भी इसी मंत्वय की पुष्टि करती है।

 

Edited By: Saurabh Chakravarty