आजमगढ़, जेएनएन। कोरोना काल में विश्व प्रसिद्ध निजामाबाद की ब्लैक पॉटरी और मुबारकपुर की रेशमी साड़ी उत्पाद के हस्तशिल्पियों का हुनर और निखरेगा। साथ ही इस कारोबार से गैर प्रांतों व जिले से आए प्रवासियों को भी स्व-रोजगार का अवसर मिलेगा। शासन की पहल पर इसकी तैयारी अंतिम चरण में चल रही है।

वित्तीय वर्ष 2020-21 की योजना के अंतर्गत एक जिला, एक उत्पाद (ओडीपी) में चयनित ब्लैक पॉटरी और रेशमी साड़ी (वस्त्रोद्योग) से जुड़े 200 हस्तशिल्पियों का चयन किया गया है। इसमें 100 ब्लैक पॉटरी एवं 100 रेशमी साड़ी उत्पाद से जुड़े कारीगर शामिल हैं। उद्यमिता विकास संस्थान की ओर से 25-25 के ग्रुप में इन्हें 10 दिन का आवासीय प्रशिक्षण दिया जाएगा। साथ ही प्रतिदिन के हिसाब से मानदेय एवं इनके उत्पाद से  जुड़े टूलकिट भी दिए जाएंगे। इसके बाद परंपरागत उद्योग के बढ़ावा के लिए बैंक से ऋण मिलेगा, जिस पर शासन की तरफ से अनुमन्य अनुदान भी दिया जाएगा। उद्योग विकसित होने के बाद इसमें प्रवासियों को रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा।

जल्द ही प्रशिक्षण दिया जाएगा

प्रवासियों को स्व-रोजगार दिलाने और ब्लैक पॉटरी व रेशमी साड़ी उत्पाद को बढ़ावा देने के लिए चयन प्रक्रिया पूरी हो गई है। जल्द ही प्रशिक्षण दिया जाएगा।

-प्रवीण मौर्य, उपायुक्त, उद्योग एवं प्रोत्साहन केंद्र।

ये भी जानें

-50 परिवार ब्लैक पॉटरी उद्योग से जुड़े हैं।

-150 परिवार टेराकोटा उद्योग से जुड़े हैं।

-1200 सदस्य मिट्टी कारोबार से जुड़े हैं।

-2-3 करोड़ सालाना का कारोबार होता है।

मुगलकाल से ही काली मिट्टी के बर्तन बनाने में पूरा गांव लगा रहता है

जिले ऐतिहासिक कस्बा निजामाबाद में मुगलकाल से ही काली मिट्टी के बर्तन बनाने में पूरा गांव लगा रहता है। इस कला में लगे लगभग 10 गांव के 15,00 कारीगर अपनी कला से मिट्टी को आकार देकर विश्व में जिले की पहचान बनाए हैं। उद्योग को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा पहले जीआइ सूचकांक मिला। इसके बाद 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडकट' योजना के अंतर्गत चयनित निजामाबाद की ब्लैक पॉटरी कारोबार ने रफ्तार पकड़ ली है। केंद्र व प्रदेश सरकार द्वारा हस्तशिल्पियों को पुरस्कृत किए जाने के साथ अब ऋण की भी योजना प्रभावी हो गई। इसके बाद तो कारीगर अपने हुनर से विश्व में ब्लैक पाटरी का परचम लहरा रहे हैं। अकेले मोहल्ला हुसैनाबाद के लगभग दो दर्जन उद्यमी राज्य पुरस्कार, स्टेट अवार्ड व राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजे जा चुके हैं। इतनी उपलब्धियों के बाद भी इस कला के लिए सही संसाधन उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। कारीगरों की माने तो बाजार होता तो उनकी स्थिति और भी बेहतर होती।

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