सौरभ चक्रवर्ती, वाराणसी : भूगर्भ जलस्तर लगातार नीचे भाग रहा है। अगर उतनी तेजी से जनपद में पानी को बचाने के लिए हम लोग आगे नहीं आए तो स्थिति बेहद नाजुक हो सकती है। पीढि़यां बूंद-बूंद पानी के लिए तरसने को विवश होंगी। जलस्तर हर वर्ष इंच दर इंच नीचे ही भाग रहा है। अगर हम दिनचर्या में भी पानी के इस्तेमाल में बड़ा बदलाव कर लें तो जल को सहेजने में काफी मदद मिल सकती है। भूजल स्तर का गिरना चिंताजनक है, गांवों में अभी स्थिति इतनी गंभीर नहीं है। शहरों में भूजल का रीचार्जिग नहीं होता है, इसके लिए लोग कालोनी में रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के माध्यम से सामूहिक रूप से जल संचयन कर सकते हैं। प्रति व्यक्ति मानक 45 लीटर, खर्च कर रहे 400 लीटर

भूगर्भ जल के विशेषज्ञों की मानें तो प्रति व्यक्ति पानी की आवश्यकता रोजाना 35 से 45 लीटर के आस-पास है, लेकिन यह खपत 400 लीटर के पार पहुंच चुकी है। ब्रश, शौच, नहाने व कपड़ा धोने से लेकर पूरी दिनचर्या निबटाने तक में इतना पानी हर आदमी बर्बाद कर रहा है। परंपरागत खेती से 85 फीसद पानी बर्बाद

परंपरागत खेती से 85 प्रतिशत भूगर्भ जल बर्बाद हो जा रहा है। बीएचयू के तकनीकी एक्सपर्ट की रिपोर्ट कुछ ऐसा ही इशारा कर रही है। इस पानी की बर्बादी को टपक सिंचाई पद्धति को अपना कर किसान आसानी से रोक सकते हैं। जिले में खेती का रकबा एक लाख हेक्टेयर के आस-पास है। करीब 20 हजार किसान परिवार यहा पर सिर्फ परंपरागत खेती पर ही निर्भर हैं। धान व गन्ने की फसल को दूसरे की अपेक्षा ज्यादा पानी की आवश्यकता होती है। प्रति हेक्टेयर धान की खेती में खर्च हो रहा 60 लाख लीटर भूजल

बनारस जिले में धान की बात करें तो एक हेक्टेयर रकबे में औसतन 24 क्िवटल धान का उत्पादन होता है। भूगर्भ वैज्ञानिकों की मानें तो एक क्िवटल धान पैदा करने में ढाई लाख लीटर पानी खर्च होता है। यह जल ट्यूबवेल से निकला जाता है। इस तरह 24 कुंतल धान के उत्पादन में औसतन 60 लाख लीटर पानी की आवश्यकता होती है। धान के अलावा गन्ने की फसल को पानी अधिक चाहिए होता है। किसान अगर परंपरागत खेती को छोड़कर टपक सिंचाई पद्धति अपनाए तो भूजल दोहन को रोका जा सकता है। कुछ यूं बर्बाद हो रहा पानी

2500 लीटर : एक किलोग्राम चावल के उत्पादन में।

1300 लीटर : एक किलोग्राम गेहूं के उत्पादन में।

70 लीटर : एक सेब की पैदावार में।

40 लीटर : एक ब्रेड स्लाइस बनाने में।

10 लीटर : ए फोर साइज का एक कागज तैयार करने में।

(आकड़े भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार)

Posted By: Jagran