वाराणसी, जेएनएन। स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रपति पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई है। वर्ष 2019 में मिलने वाले पुरस्कारों की सूची में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के वेद विभाग के पूर्व प्रो. युगल किशोर मिश्र व व्याकरण के विद्वान प्रो. मनुदेव भट्टाचार्या भी शामिल हैं। राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए चयनित प्रो. शुक्ल ने कहा कि संस्कृत वैज्ञानिक दृष्टि से भी समृद्ध भाषा है। कंप्यूटर व विज्ञान के लिए संस्कृत भाषा सबसे उपयोगी है। यदि अंग्रेजी के स्थान पर संस्कृत भाषा में विज्ञान का अध्ययन-अध्यापन हो तो ज्ञान-विज्ञान और भी समृद्ध होगा।

आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को संस्कृत में समाहित करने की जरूरत : प्रो. मिश्र

जागरण प्रतिनिधि से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि संस्कृत को सभी भाषाओं की जननी है। यह हम भी जानते हैं। फिर भी संस्कृत की महत्ता के अनुसार इसे महत्व नहीं दे रहे हैं। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को संस्कृत भाषा में समाहित करने की आवश्कता है ताकि देश की नई पीढ़ी में संस्कृत भाषा का संचार व वैज्ञानिकता का बोध हो सके। इसके लिए बेसिक से संस्कृत अनिवार्य करने की जरूरत है।

वेद के प्रकांड विद्वान

रविंद्रपुरी के निवासी प्रो. मिश्र वेद के प्रकांड विद्वान है। प्रारंभिक से लगायत उच्च शिक्षा आपने बीएचयू से पूरी की। वर्ष 1995 कला विभाग, बीएचयू में बतौर संस्कृत प्रवक्ता नियुक्त हो गए। वर्ष 1981 में बीएचयू छोड़कर संस्कृत विश्वविद्यालय चले गए। यहां वेद विभाग के प्रोफेसर पद पर ज्वाइन किया। इस दौरान वेद विभागाध्यक्ष, संकायाध्यक्ष व प्रति कुलपति सहित अनेक पदों पर कार्य किया। वर्ष 2016 में संस्कृत विवि से सेवानिवृत्त हुए। वर्तमान में आप भारत अध्ययन केंद्र, बीएचयू में सम्मानित प्रोफेसर हैं।

राजस्थान के कुलपति भी रहे

प्रो. मिश्र वर्ष 2008 से 10 तक राजस्थान संस्कृत विवि (जयपुर)  के कुलपति व वर्ष 1997 में मानव संसाधन व विकास मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय वेद विज्ञान प्रतिष्ठान के सचिव पद पर भी कार्य कर चुके हैं।

अनेक पुरस्कार : प्रो. मिश्र को आस्ट्रेलिया, पेरिस, नेपाल, इटली, मारीशस, थाईलैंड, सिंगापुर सहित अनेक देशों से विभिन्न पुरस्कार मिले हैं। इसमें सरस्वती पुरस्कार, व्यास सम्मान, विक्रम कालिदास, हरिहरानंद स्मृति, व्यास, कालिकानंद सहित अन्य पुरस्कार शामिल हैं।   

संस्कृत का व्याकरण सभी भाषाओं से समृद्ध : प्रो. मनुदेव

प्रो. मनुदेव भट्टाचार्या ने बताया कि संस्कृत बहुत ही समृद्ध व सरल भाषा है। व्याकरण की दृष्टि से भी संस्कृत का कोई जोड़ नहीं हैं। इसके बावजूद संस्कृत का ज्ञान-विज्ञान किताबों में ही सिमट का रह गया है। किताबों व पांडुलिपियों के रूप में प्राच्य विद्या के खजाने देश व दुनिया के सामने लाने की आवश्कता है। संस्कृत के गूढ़ रहस्यों पर गहन शोध करने की आवश्यकता है। विज्ञान जो आज खोज कर रहा है। उसकी खोज हमारे  ऋषि-मुनियों ने हजारों साल ही कर चुके हैं।

पश्चिम बंगाल के मूल निवासी प्रो. मनुदेश भट्टाचार्या व्याकरण के प्रकांड विद्वान हैं। वर्ष 1957 में संस्कृत पढऩे प्रो. मनुदेव काशी चले आए। आचार्य करने के बाद 1977 में आप गोयनका संस्कृत महाविद्यालय के कॅरियर की शुरूआत है। वर्ष 1983 में गोयनका को छोड़कर संस्कृत विवि आ गए। वर्ष 2008 सेवानिवृत्त होने के बाद वर्ष 2015 तक बीएचयू में बतौर अतिथि अध्यापक रहे। अब तक आपकी 11 महाकाव्य, 20 से अधिक पुस्तक व 100 से अधिक लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुका है।

 

Posted By: Saurabh Chakravarty