जागरण संवाददाता, वाराणसी : काशी का अर्थ है प्रकाश स्तंभ। दुनिया के अधिकांश पर्यटक एफिल टावर देखने जाते हैं जो स्टील का एक स्तंभ है। लोग माउंट एवरेस्ट भी नहीं जाते, जबकि उन्हें ज्ञान के प्रकाश के इस स्तंभ तक आना चाहिए। पर्यटकों के इस अनुपात से पता चलता है कि दुनिया किस मनोदशा में जी रही है। यह बातें सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने कही। वह शुक्रवार की शाम होटल ताज के दरबार हाल में अपने शिष्यों के साथ सत्संग कर रहे थे। अपने आत्मज्ञान दिवस पर वह ईशा सेक्रेड वाक के अंतर्गत काशी क्रमा पर देश-विदेश के सैकड़ों शिष्यों के साथ यहां पहुंचे हैं।

उन्होंने कहा कि यहां विश्व भर के लोगों को आना चाहिए। काशी भगवान शिव की नगरी है, यह जीवन में संतुलन सिखाती है। भगवान शिव से बेहतर संतुलन साधक और कोई नहीं। शिव का अर्धनारीश्वर रूप स्त्री-पुरुष समानता एवं संतुलन का प्रतीक है। नवरात्र महात्म्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नवरात्र देवी के नौ स्वरूपों की आराधना का पर्व है। दुनिया की सभी प्राचीन सभ्यताओं में देवी की उपासना का प्रमाण मिलता है किंतु अब यह केवल भारत में ही बचा है। यह पर्व दुनिया में स्त्री शक्ति की स्थापना का पर्व है।

विश्व में हो रहा स्त्री गुणों का विनाश

सद्गुरु ने कहा कि वर्तमान में संपूर्ण विश्व में स्त्री गुणों का विनाश हो रहा है। पुरुषवाद बढ़ता जा रहा है। यह स्थिति इस हद तक प्रबल हो चुकी है कि खुद महिलाएं पुरुष बनना चाहती हैं या उनकी तरह दिखना चाहती हैं। यह एक विचित्र स्थिति है, ऐसे में अंतत: स्त्रियां केवल दुख ही पाएंगी। उन्होंने कहा कि स्त्री और पुरुष सृष्टि रूपी पृथ्वी के दो ध्रुव हैं। जिस तरह उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव पर पृथ्वी टिकी है और सृष्टि चल रही है। यदि उत्तरी ध्रुव दक्षिणी ध्रुव पर चला जाए तो क्या होगा, पृथ्वी नष्ट हो जाएगी। उत्तरी ध्रुव पिघल भी रहा है, वह भूमध्य रेखा तक आएगा और फिर अंतत: दक्षिण ध्रुव चला जाएगा। यही स्थिति स्त्री-पुरुष मनोदशा की है।

धार्मिक लोग न तय करें, स्त्रियां क्या पहनें, कैसी दिखें

सद्गुरु ने कहा कि आज ईरान में हिजाब को लेकर प्रदर्शन हो रहा है। धार्मिक लोग यह न तय करें कि स्त्रियां क्या पहनें, कैसी दिखें। दरअसल यहां भी पुरुषवादी सोच प्रभावी है। एक वर्ग यह चाहता है कि स्त्रियों का इंच-इंच शरीर ढका रहे, दूसरा वर्ग चाहता है कि उनके कपड़े इंच-इंच छोटे होते जाएं। स्त्रियां दोनों मनोदशाओं के लोगों के बीच फंसी हुई हैं। स्त्री को खुद यह तय करना होगा कि वह क्या पहने, कैसी दिखें। उन्होंने कहा कि मैं बस ध्रुवों के बीच संतुलन लाने के प्रयास में लगा हूं। दुनिया और मनुष्य का जीवन तभी संतुलित रहेगा, जब सभी ध्रुव अपने-अपने स्थान पर स्थिर हों।

किया काशी विश्वनाथ का दर्शन, मणिकर्णिका पर जीवन की निस्सारता का शिष्यों को कराया बोध

इसके पूर्व सद्गुरु ने सुबह श्रीकाशी विश्वनाथ धाम पहुंचकर भगवान शिव का दर्शन-पूजन किया। पवित्र महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पहुंचकर शिष्यों को जीवन की निस्सारता का बोध कराया। कहा, जीवन में तमाम परिस्थतियां आती हैं, आप स्वयं में उन परिस्थितियों को औरों से पहले देख लेने की दृष्टि विकसित करें। तभी जीवन में बेहतर यात्री बन सकते हैं। आपके आसपास सब कुछ बदल जाए, इससे बेहतर है कि उससे पहले आप बदल जाएं।

23 बसों में भरकर आए हैं शिष्य

सद्गुरु के साथ इस आध्यात्मिक यात्रा पर 23 बसों में शिष्य भरकर आए हैं। इनमें देश के विभिन्न राज्यों के अलावा अनेक देशों के नागरिक सम्मिलित हैं। वर्ष 2019 में यहां आए सद्गुरु ने बताया था कि जब वह 25 वर्ष के थे, तब उन्हें मैसूर में 23 सितंबर को ही ज्ञान प्राप्त हुआ था। अब से इस आत्मज्ञान दिवस को वह प्रतिवर्ष काशी में मनाएंगे।

Edited By: Saurabh Chakravarty