वाराणसी [वंदना सिंह]। कचरे में खाने की तलाश में वह इंसान छटपटा रहा था। अचानक उसे कुछ खाना नजर आया हालांकि वह गंदगी से लिपटा था मगर भूख से बेबस बेदम इंसान ने झट से उसे उठाया और खाने लगा। वह भले ही मानसिक रोगी था, मगर था तो इंसान ही। वहां बैठे ज्ञानी लोगों ने न तो उसे रोका और न ही कुछ खाने को दिया। यह बात किशोर को चुभी और उसी दिन से उन्होंने भूखों को भरपेट भोजन कराने की ठानी। घर-घर जाकर खाना मांगते और रात में उसे गरीबों में बांटते। यहीं से किशोर ने रोटी बैंक की स्थापना की।

बिहार से संबंधित किशोर कांत 2010 में ट्यूमर का इलाज कराने बीएचयू आए और फिर यहीं के होकर रह गए। नौकरी छोड़कर अपनी मां के साथ किराए पर रहते हैं और हाईस्कूल तक के गरीब बच्चों के लिए शिक्षा बैंक खोला है, जो निशुल्क है। किशोर बताते हैं कि 2017 की बात है जब उस भूखे व्यक्ति ने मुझे झकझोर के रख दिया। मैं तुरंत मां से 20 लोगों के लिए खाना बनाने का पूछा। मां ने झट से खाना बनाया और पिताजी संग खिलाने निकल पड़ा। करीब 15 दिनों तक मैंने यह काम किया। इस दौरान कुछ ने ताने मारे, तो कुछ ने साथ भी दिया। सामने घाट पर रोटी बैंक संस्था के नाम से कार्यालय बनाया। सुंदरपुर से व सनबीम भगवानपुर के हॉस्टल से रोजाना 50 लोगों का खाना मिलने लगा। मैं अपने स्टूडेंट रोशन पटेल के साथ बिना गैप किए बांटता। अब बनारस में हमारी 12 लोगों की टीम है।

सोशल मीडिया ने की मदद : किशोर ने बताया कि सोशल मीडिया पर रोटी बैंक और अपना मोबाइल नंबर डाल दिया था, तो शादियों के बचे-कुचे खाने भी मुझे मिलने लगे, जिसे रात में ही गरीबों को बांटने लगा। रोटी बैंक के 24 हजार से ज्यादा फेसबुक फालोअर्स हैं।

24 शहरों में है रोटी बैंक : उत्तरप्रदेश सहित देश के छह राज्यों के 24 शहरों में रोटी बैंक की शाखा है। 1000 से ज्यादा लोग संस्था से जुड़ चुके हैं। फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड ऑफ इंडिया ने भी इसे अथराइज्ड किया है।

गरीबों को रोजगार : दूरदराज गरीबों को खिलाना संभव नहीं था तो उनकी रोजी के लिए उन्हें वजन मापी मशीन दी गई।

Posted By: Abhishek Sharma

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