वाराणसी, जेएनएन। रमजानुल मुबारक का आखिरी अशरा 'जहन्नुम से आजादी' का है, जो रविवार को मगरिब की अजान के साथ शुरू हुआ। इस उपलक्ष्य में मगरिब से ठीक पहले एतेकाफ में बैठने वाले इबादतगुजार मस्जिदों में दाखिल हुए। वहीं शब-ए-कद्र की पहली रात लोगों ने घरों व मस्जिदों में इबादत-ए-इलाही में मशगूल होकर गुजारी। एतेकाफ में बैठने वाले इबादतगुजार दुनिया की फिक्र से दूर रमजान का आखिरी अशरा (दस दिन की अवधि) मस्जिद में ही रहकर गुजारेंगे और ईद के चांद की तस्दीक के बाद ही मस्जिद से बाहर आएंगे। हाफिज शकील के अनुसार शब-ए-कद्र वो अजीम रात है, जिसके बारे में फरमाया गया है कि ये रात हजार महीनों से भी अफजल है। इस रात किसी एक शख्स के एतेकाफ में बैठने पर पूरे मोहल्ले पर खुदा की रहमत नाजिल होती है। इसलिए रमजान के आखिरी अशरे की ताक रातों (21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं व 29वीं रात) में इबादतों के जरिए इसकी तलाश करने को कहा गया है। एतेकाफ में बैठने वालों का हर लम्हा इबादतों में शुमार होता है। उधर, शब-ए-कद्र की पहली रात में लोगों ने इशा की नमाज पढ़कर कुछ देर आराम किया। इसके बाद घरों व मस्जिदों में नफ्ली नमाज का एहतेमाम किया गया। तस्बीह, तिलावते कलामपाक व नफ्ली नमाजों का सिलसिला रातभर चलता रहा। लोगों ने अपने-अपने अंदाज में खुदा की बारगाह में कारोबार, घर-परिवार व मुल्क व मिल्लत के लिए दुआएं मांगी।

शहादत के सिलसिले से मातमी जुलूस आज जासं, वाराणसी : पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मोहम्मद मुस्तफा (सल्ल.) के दामाद हजरत अली की शहादत 21 रमजान को हुई थी। रमजानुल मुबारक की 19वीं रात को नमाज के दौरान सर पर तलवार से वार किया गया था। आप तीन दिन तक जिंदा रहे उसके बाद 21वीं रमजान को शहीद हुए। शिया जामा मस्जिद के प्रवक्ता सैयद फरमान हैदर ने बताया कि शहादत के गम में शिया हजरात मुकीमगंज, चौहंट्टालाल खां, दोसीपुरा आदि क्षेत्रों से अलम व ताबूत का जुलूस निकालेंगे। जुलूस अपने कदीमी रास्ते से होता हुआ मगरिब से पहले लाटसरैयां स्थित सदर इमामबाड़ा पहुंचकर समाप्त होगा। यहीं पर शिया हजरात रोजा इफ्तार भी करेंगे। उधर, सुन्नी हजरात की ओर से लाट सरैंया मस्जिद में कदीमी इफ्तार का आयोजन होगा।

लोकसभा चुनाव और क्रिकेट से संबंधित अपडेट पाने के लिए डाउनलोड करें जागरण एप

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस