करोड़ों वर्ष पहले ज्वालामुखी और भूकंप के बीच बनते थे कोयले के भंडार, बीएचयू और गुवाहाटी विश्वविद्यालय के शोध का निष्कर्ष
काशी हिंदू विश्वविद्यालय और गुवाहाटी विश्वविद्यालय के विज्ञानियों ने पूर्वी हिमालय के सियांग विंडो क्षेत्र में करोड़ों वर्ष पुरानी भूवैज्ञानिक ...और पढ़ें

पूर्वी हिमालय में करोड़ों वर्ष पहले ज्वालामुखी और भूकंप के बीच बने कोयले के रहस्य उजागर।
HighLights
सियांग विंडो में करोड़ों वर्ष पुरानी भूवैज्ञानिक हलचलों का खुलासा।
27-29 करोड़ वर्ष पहले के कोयला भंडार बनने का इतिहास।
हिमालयन थ्रस्टिंग से चट्टानों की तापीय संरचना में बदलाव।
संग्राम सिंह, जागरण, वाराणसी। पूर्वी हिमालय के सियांग विंडो (अरुणाचल प्रदेश) क्षेत्र में करोड़ों वर्ष पुरानी भूवैज्ञानिक हलचलों को लेकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) और गुवाहाटी विश्वविद्यालय के विज्ञानियों ने साझा शोध में नए तथ्य उजागर किए हैं। 27 से 29 करोड़ वर्ष पुराने 'अर्लीपरमियन' काल की 'भरेलीफार्मेशन' की चट्टानों का अध्ययन कर पृथ्वी के तत्कालीन वातावरण, जंगलों की आग और ज्वालामुखी सक्रियता का नया इतिहास सामने रखा है।
यह महत्वपूर्ण अध्ययन भूविज्ञान जगत की प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका इंटरनेशनल जर्नल आफ अर्थ साइंसेज में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं की टीम में गुवाहाटी विश्वविद्यालय के डा. दीपज्योति बोरसाइकिया व डा. मौसमी गोगोई और बीएचयू के डा. गोविंद कुमार व डा. अमिय शंकर नायक सहित समेत छह शोधकर्ता शामिल हैं।
विज्ञानियों ने अत्याधुनिक पेट्रोग्राफिक (चट्टान संरचना), आइसोटोपिक और स्पेक्ट्रोस्कोपिक तकनीकों का उपयोग कर पता लगाया है कि यह पूरा क्षेत्र कभी प्राचीन महाद्वीप गोंडवाना का उत्तरी छोर हुआ करता था। कार्बन के विशेष समस्थानिक दर्शाते हैं कि उस समय यहां ग्लोसोप्टेरिस नाम के विशाल प्रागैतिहासिक पौधों के घने जंगल थे।
चट्टानों में पाए गए विशेष कोयला तत्वों (इनर्टिनाइट और माइक्रिनाइट) से साबित होता है कि उस दौर में इन जंगलों में बार-बार विनाशकारी आग लगती थी, जिसके बाद जलमग्न दलदली क्षेत्रों में पीट (कोयले का प्रारंभिक रूप) का संचय होता था। आमतौर पर मानते हैं कि भारत के प्रायद्वीपीय क्षेत्रों (जैसे झारखंड या ओडिशा के गोंडवाना बेसिन) में कोयले की बहुत मोटी और स्थिर परतें पाई जाती हैं, लेकिन पूर्वी हिमालय का यह क्षेत्र उस समय बहुत अलग था।
यह क्षेत्र भूगर्भीय रूप से लगातार धंस रहा था और ज्वालामुखी विस्फोटों व भूकंपीय गतिविधियों के कारण जलस्तर तेजी से बदलता रहता था। इसी अस्थिरता की वजह से यहां आस्ट्रेलिया के सिडनी-बोवेन बेसिन की तरह ही पतली, लेकिन विशिष्ट कोयले की परतें बनीं। यह शोध हिमालय की उत्पत्ति और भारत के कोयला भंडारों के इतिहास को समझने में मदद करेगा।
अत्यधिक घर्षण और गर्मी ने चट्टानों की तापीय संरचना को पूरी तरह बदला
विज्ञानियों ने जब चट्टानों की परिपक्वता और रमन सूचकांकों की जांच की तो अनोखी बात सामने आई। आमतौर पर जमीन में जितनी गहराई पर जाएं, गर्मी और दबाव के कारण चट्टानें उतनी ही परिपक्व होती हैं, लेकिन इस क्षेत्र में उल्टा पाया गया।
करोड़ों साल बाद जब हिमालयन थ्रस्टिंग (हिमालय पर्वत के बनने की प्रक्रिया में चट्टानों का आपस में टकराकर ऊपर चढ़ना) हुई, तो उस अत्यधिक घर्षण और गर्मी ने इन चट्टानों की तापीय संरचना को पूरी तरह बदल दिया। यही कारण है कि यहां गहराई के बजाय स्थानीय टकराव वाले हिस्सों में कोयले और शेल की परिपक्वता कहीं ज्यादा दिखाई देती है।
