वाराणसी [सौरभ चक्रवर्ती] Rani Laxmi Bai Death Anniversary (जन्म : 19 नवंबर 1835, निधन : 18 जून 1858) जिस समय देश के विभिन्न रियासतों के राजा ब्रिटिश हुकूमत के सामने घुटने टेक रहे थे तब रानी लक्ष्मीबाई ने उनका जमकर मुकाबला किया। इतना ही नहीं काशी की मनु ने अपनी युद्धकला से अंग्रेजों के दांत भी खट्टे किए। लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1835 को काशी में मराठी कराड़े ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

भदैनी में रहता था मनु का परिवार

काशी के धार्मिक महत्व के कारण पेशवाओं को यहां से काफी लगाव था, जो कि अक्सर यहां आते रहते थे। अपने बनारस प्रवास के दौरान वे गंगा उस पार रेती में घुड़सवारी और तलवारबाजी का अभ्यास भी किया करते थे। अस्सी-भदैनी में पेशवा का किला भी था। रानी लक्ष्मीबाई की जन्मस्थली से जुड़े जागृति फाउंडेशन के महसचिव रामयश मिश्र ने बताया कि लक्ष्मीबाई अपने पिता के साथ गंगा के उस पार जाती थीं और घुड़सवारी व तलवारबाजी का अभ्यास देखती थीं। बचपन में पड़ी युद्धकला की नींव भविष्य में उनके बहुत काम आई।

बचपन में हो गई थी मां की मृत्यु

भदैनी क्षेत्र में मोरोपंत तांबे की पत्नी भागीरथी बाई ने एक पुत्री को जन्म दिया। पुत्री का नाम मणिकॢणका रखा गया। प्यार से सब उसे मनु भी बुलाते थे। मनु जब चार-पांच वर्ष की थीं तभी उनकी मां का देहांत हो गया था। पिता मोरोपंत मराठा पेशवा बाजीराव की सेवा में थे। चूंकि घर में मनु की देखभाल के लिए कोई नहीं था। इसलिए पिता अपने साथ मनु को बाजीराव के दरबार में ले गए, जहां चंचल मनु ने सबका मन मोह लिया।

...और बन गईं झांसी की रानी

बचपन में ही शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा लेने के दौरान लोग उन्हेंं प्यार से छबीली के नाम से भी पुकारने लगे। पेशवा बाजीराव के बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक आते थे। मनु भी उन्हीं बच्चों संग पढऩे लगीं। मनु ने पेशवा के बच्चों के साथ ही तीर-तलवार तथा बंदूक से निशाना लगाना सीखा। उनका विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव के साथ हो गया और वह झांसी की रानी बनी और उनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया।

वीरांगना की गाथाएं बता रहीं दीवारें

रानी लक्ष्मी बाई की जन्मस्थली भदैनी की दीवारों पर बनी कलाकृतियों में उनके जन्म से लेकर उनके शहीद दिवस तक के जीवन चक्र को उकेरा गया है। उनके बाल्यकाल में नाना साहब संग प्रशिक्षण लेना, घुड़सवारी, अंग्रेजों से लड़ाई सहित कई प्रसंग दर्शाये गए हैैं।

 

वीरांगना लक्ष्मीबाई की स्मृति में जले दीप

आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के दांत खट्टे कर देने वाली देश की प्रथम महिला वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि पर दो दिवसीय स्मृति समारोह का शुभारंभ बुधवार को भदैनी स्थित उनकी जन्मस्थली पर हुआ।  जागृति फाउण्डेशन के तत्वावधान में अयोजित स्मृति समारोह  में दीप जलाकर वीरांगना व भारत- चीन सीमा पर शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धा अर्पित की गई। समारोह का  शुभारंभ मुख्य अतिथि भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अशोक पाण्डेय,  साहित्यकार  डॉ जयप्रकाश मिश्र ,विशिष्ट अतिथि योगचार्य पं. विजय प्रकाश मिश्र, महामना मदन मोहन इंटर कालेज के प्राचार्य संजय प्रियदर्शी, नवीन सेवा समिति के नवीन वाजपेयी व विजय दत्त त्रिपाठी ने दीप जलाकर किया। भजपा के प्रदेश प्रवक्ता अशोक पाण्डेय ने कहा कि काशी की बेटी व झांसी की रानी ने स्वतंत्रता संग्राम में अपना बलिदान दिया। महारानी ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए। काशी की इस बेटी पर हमें गर्व है।  योगाचार्य विजय प्रकाश मिश्र  ने कहा कि वीरांगना ने देश को आजाद कराने में जो अपना अमूल्य योगदान दिया है उसे देश की पीढ़ी कभी नहीं भूलेगी।  संजय प्रियदर्शी ने कहा कि हमें वीरांगना के बताये हुए रास्ते पर चलते हुए देश की आन बान शान के लिए हमेशा आगे रहना होगा। इस अवसर पर कार्यक्रम के संयोजक एवं जागृति फाउण्डेशन के महासचिव रामयश मिश्र ने केंद्र सरकार से वाराणसी से ग्वालियर तक जाने वाली बुंदेलखंड एक्सप्रेस का नाम वीरांगना एक्सप्रेस रखने की मांग करते हुए कहा कि इसको लेकर वह पूर्व रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा व प्रधानमंत्री के संसदीय कार्यालय मे ज्ञापन देकर मांग कर चुके हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। कार्यक्रम का संचालन रामयश मिश्र ने किया तथा धन्यवाद विनय कुमार मिश्र ने किया ।

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