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काशी के 2800 साल पुराने इतिहास को सुरक्षित रखने के लिए राजघाट का संरक्षण जरूरी, विकास और विरासत का संतुलन

Published: Wed, 26 Aug 2026 10:52 PM (GMT+05:30)

राजघाट पुरास्थल काशी के आरंभिक नगरीय विकास की महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसका इतिहास 8वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक जाता है।

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HighLights

  1. राजघाट काशी के 8वीं शताब्दी ईसा पूर्व के इतिहास का प्रमाण।

  2. रेलवे विकास परियोजनाओं में पुरातात्विक संरक्षण को प्राथमिकता दें।

  3. वैज्ञानिक सर्वेक्षण और विरासत प्रभाव आकलन अनिवार्य है।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। गंगा और वरुणा नदियों के संगम के निकट स्थित ऐतिहासिक राजघाट पुरास्थल काशी के आरंभिक नगरीय विकास की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। उत्खनन से मिले पुरावशेषों के आधार पर इस स्थल की सांस्कृतिक परंपरा लगभग आठवीं शताब्दी ईसा पूर्व तक जाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि राजघाट की प्रत्येक पुरातात्विक परत तत्कालीन जीवन, अर्थव्यवस्था, तकनीक और सामाजिक संरचना के अमूल्य इतिहास को समेटे हुए है। ऐसे में किसी भी पुरातात्विक परत का नष्ट होना इतिहास के ऐसे अध्याय को खोने जैसा है, जिसे पुनः निर्मित नहीं किया जा सकता।

राजघाट और रेलवे विकास का संबंध दशकों पुराना है। वर्ष 1940 में काशी रेलवे स्टेशन के विस्तार के दौरान हुई खोदाई में ही प्राचीन अवशेष पहली बार सामने आए थे, जिसके बाद हुए उत्खननों ने इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व को साबित किया।

वर्तमान में जब काशी रेलवे स्टेशन के पुनर्विकास और इंटर माडल स्टेशन जैसी बड़ी परियोजनाओं के माध्यम से रेल, सड़क और जल परिवहन को जोड़ने का काम हो रहा है, तब प्राचीन इतिहास का संरक्षण एक मुख्य चुनौती बन गया है।

शहर के आधुनिकीकरण व बेहतर यातायात व्यवस्था की आवश्यकता से इन्कार नहीं किया जा सकता है, लेकिन राजघाट जैसे संवेदनशील पुरास्थल के निकट निर्माण कार्यों के लिए पुरातात्विक संरक्षण को परियोजना की शुरुआत से ही शामिल करना अनिवार्य है।

विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी निर्माण, नींव, भूमिगत संरचना या जल-निकासी कार्य से पहले वैज्ञानिक पुरातात्विक सर्वेक्षण और विरासत प्रभाव आकलन कराया जाना चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में खास पुरातात्विक साक्ष्य मिलने की संभावना हो तो विशेषज्ञों की निगरानी में परीक्षण-उत्खनन कराया जाए या आवश्यकता पड़ने पर परियोजना के डिजाइन व स्थान में बदलाव पर विचार किया जाए।

दीर्घकालिक नीति और संवेदनशीलता मानचित्र की आवश्यकता

राजघाट के स्थायी संरक्षण के लिए विशेषज्ञों ने कई प्रमुख कदम उठाने का सुझाव दिया है। प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष प्रो. महेश प्रसाद अहिरवार कहते हैं कि क्षेत्र का पुरातात्विक संवेदनशीलता मानचित्र तैयार किया जाना चाहिए ताकि अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर वहां निर्माण को नियंत्रित किया जा सके। परियोजना मानचित्र, विशेषज्ञों की सिफारिशें और संरक्षण अनुमतियां सार्वजनिक की जानी चाहिए।

संरक्षण प्रक्रिया में स्थानीय समुदाय, इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और नागरिक समाज को सक्रिय रूप से शामिल किया जाए। विकास और विरासत परस्पर विरोधी नहीं हैं। बेहतर योजना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाकर आधुनिक परिवहन सुविधाओं का विस्तार करते हुए प्राचीन काशी की पुरातात्विक स्मृति को सुरक्षित रखा जा सकता है।