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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 29, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Premchand Jayanti 2022 : काव्य-कहानी से खुलेंगे मुंशी जी की स्मृतियों के पट, तीन दिवसीय लमही महोत्सव आज से

By Saurabh ChakravartyEdited By:
Published: Fri, 29 Jul 2022 12:07 AM (IST)

Premchand Jayanti 2022 उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र वाराणसी की ओर से तीन दिवसीय आयोजनों ...और पढ़ें

उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर तीन दिवसीय आयोजनों की शृंखला शुक्रवार से शुरू हो रही है।
उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर तीन दिवसीय आयोजनों की शृंखला शुक्रवार से शुरू हो रही है।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र वाराणसी की ओर से तीन दिवसीय आयोजनों की शृंखला शुक्रवार से शुरू हो रही है। इसका श्रीगणेश कहानी व कविता लेखन प्रतियोगिता से होगा। इसमें विभिन्न विद्यालयों के बच्चे मेधा दिखाएंगे।

वहीं 29-30 को काशी विद्यापीठ के केंद्रीय पुस्तकालय सभागार में प्रेमचंदः अध्यापक और पत्रकार विषयत राष्ट्रीय संगोष्ठी होगी। इसके अलावा 30 जुलाई को सीएम एंग्लो बंगाली इंटर कालेज में सुबह 11 बजे से प्रेमचंद की रचनाओं पर आधारित चित्रकला प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी।

क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र प्रभारी डा. सुभाष चंद्र यादव ने बताया कि जयंती पर 31 जुलाई को मुंशी प्रेमचंद स्मारक लमही में सुबह 10 बजे पुष्पांजलि दी जाएगी। प्रभात फेरी निकलेगी और अतिथियों व विद्वानों का सम्मान किया जाएगा। शाम 6.30 बजे स्मारक में प्रेमचंद दीपावली मनाई जाएगी। 

सुबह 10 बजे से रामलीला मैदान लमही में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी जाएंगी। इसमें अभिनव समिति की ओर से कठपुतली पर पंच परमेश्वर, प्रेरणा कला मंच की ओर से सवा सेर गेहूं, दिशा क्रिएशन की ओर से मैकू, मंचदूतम की ओर से साइत-सगुन, यूपी पब्लिक स्कूल की ओर से सद्गति व सनबी वीमेन्स कालेज की ओर से बेटों वाली विधवा नाट्य का मंचन किया जाएगा। इसके अलावा विष्णु यादव का लोकगायन, प्रमोद विश्वकर्मा का लोकगीत और स्कूली बच्चों द्वारा कजरी गायन होगा।

प्रेमचंद की जीवनी : 1880 और तारीख 31 जुलाई था, जब बनारस शहर से चार मील दूर लमही गांव में कहानियों के सम्राट प्रेमचंद पैदा हुए। उन्होंने बचपन में काफी गरीबी देखी। उनके पिता डाकखाने में मामूली नौकर के तौर पर काम करते थे। प्रेमचंद ने इस कदर बचपन से ही आर्थिक तंगी का सामना किया कि उनकी लेखनी में विकास के भागते पहिये की झूठी चमक कभी नहीं दिखी, बल्कि इसकी जगह लेखक ने आजादी की आधी से ज्यादा सदी गुजरने के बाद भी लालटेन-ढिबरी की रोशनी में जीने को मजबूर गरीब-गुरबों को अपनी कहानी का पात्र बनाया। अपने उपन्यास और कहानियों में गांव के घुप्प अंधेरे का जिक्र किया।