जिनका इस धरती पर कोई नहीं, उनके लिए भी काशी में अमावस्या पर हुआ पिंडदान
काशी में सर्व पितृ अमावस्या पर गंगा घाटों पर श्रद्धालुओं ने पितरों के लिए तर्पण और पिंडदान किया। इस दौरान ...और पढ़ें

काशी में सर्व पितृ अमावस्या पर पितरों संग अनाम मृतकों का भी पिंडदान।
HighLights
सर्व पितृ अमावस्या पर काशी में हुआ तर्पण-पिंडदान।
लावारिस और नेपाल त्रासदी के दिवंगतों को भी किया याद।
मणिकर्णिका घाट पर संस्थाओं ने किया विश्व पिंडदान।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। भोर की पहली किरण के साथ गंगा के घाटों पर जुटे श्रद्धालु, हाथों में तिल-जल और अंजुरी में पिंड, होठों पर मंत्र और मन में पितरों के प्रति अगाध श्रद्धा। सर्व पितृ अमावस्या पर शनिवार को काशी में ऐसा ही भावपूर्ण दृश्य साकार हुआ।
गंगा घाटों से कुंड तटों तक तर्पण-पिंडदान और दान-पुण्य के बीच लोगों ने अपने पुरखों की मुक्ति की कामना की। इसी आस्था के बीच उन अनाम मृतकों और नेपाल त्रासदी के दिवंगतों के लिए भी प्रार्थना की गई, जिनकी स्मृति में अपनों की अंजुरी शायद कभी उठ ही न सकी।
भोर होते ही रविदास घाट से आदि केशव तक श्रद्धालुओं का आवागमन आरंभ हो गया था। दशाश्वमेध घाट पर हजारों लोगों ने विधि-विधान से तर्पण और पिंडदान किया। शंकुलधारा, लक्ष्मीकुंड और पिशाच मोचन सहित विभिन्न तीर्थों पर भी श्राद्ध कर्म हुए। कहीं पुरोहित संकल्प कराते रहे, कहीं पत्तलों में पितरों के निमित्त भोजन सजाया गया।
परंपरा के अनुसार कौआ, श्वान और गाय के लिए भी भोजन निकाला गया। हालांकि, असि घाट पर बाढ़ के बाद जमी सिल्ट से बने दलदल ने श्रद्धालुओं की राह कठिन कर दी। पिंडदान के लिए बढ़ते कदम कीचड़ में धंसते और फिसलते रहे, फिर भी आस्था के संकल्प ने लोगों को कर्मकांड पूरा करने से नहीं रोका।
जिनका कोई नहीं, उनके लिए भी पिंडदान
मणिकर्णिका तीर्थ पर श्रद्धा ने सेवा का रूप लिया। श्रीकाशी विश्वनाथ डमरू दल सेवा समिति, सारडा समाज सेवा फाउंडेशन और श्रीमणिकर्णिका तीर्थ न्यास की ओर से लावारिस मृतकों की आत्मशांति के लिए विश्व पिंडदान किया गया। नेपाल त्रासदी में दिवंगत लोगों के निमित्त भी पिंडदान और 15 दिनों तक जलदान किया गया।
संस्था के प्रधान अध्यक्ष ओमनाथ शर्मा उर्फ मोनू बाबा के अनुसार, अब तक 1450 से अधिक लावारिस शवों का निश्शुल्क दाह संस्कार कराया जा चुका है। उनके लिए पिंड अर्पित कर उन्हें भी स्मरण किया गया। घाट पर मुखाग्नि देने वाले चौधरियों को अंगवस्त्र और दक्षिणा देकर सम्मानित किया गया। तर्पण-पिंडदान के बाद दीपदान के साथ पितरों को विदाई दी गई।
