बेटों की चाह में कोख में मार दी गई बेटियों के लिए दशाश्वमेध घाट पर 10 हजार अजन्मी बेटियों का पिंडदान
निर्दोष बेटियों की अतृप्त आत्माओं का आवाह्न किया। इसके बाद जौ के आटे, शहद, देसी घी, काले तिल और गंगाजल ...और पढ़ें
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अजन्मी बेटियों का हुआ काशी में पिंडदान
जागरण संवाददाता, वाराणसी। काशी के गंगा घाट पर पितृपक्ष की मातृ नवमी पर रविवार को ऐसी बेटियों की भटकती आत्माओं को मोक्ष दिलाने के लिए तर्पण और पिंडदान किया गया, जिन्हें जन्म लेने से पहले ही मां की कोख में मार दिया गया। मंत्रोच्चार के बीच वैदिक रीति रिवाज से दशाश्वमेध घाट पर 10 हजार अजन्मी बेटियों के लिए श्राद्ध कर्म किया गया।
कन्या भ्रूण हत्या के महापाप के खिलाफ मजबूत संदेश देते हुए मोक्ष नगरी में 'आगमन सामाजिक संस्था' के तत्वावधान में आयोजित इस श्राद्ध कर्म में अजन्मी बेटियों की आत्मा की शांति और सद्गति के लिए मां गंगा के किनारे की मिट्टी से पिंड वेदी का निर्माण कर भूमि संस्कार किया गया।
पांच वैदिक आचार्यों के सानिध्य में वेद मंत्रोच्चार के बीच श्राद्धकर्ता व संस्था के संस्थापक सचिव डा. संतोष ओझा ने संकल्प लेकर कोख में मारी गईं उन निर्दोष बेटियों की अतृप्त आत्माओं का आवाह्न किया। इसके बाद जौ के आटे, शहद, देसी घी, काले तिल और गंगाजल के बनाए गए 10,000 पिंडों को अजन्मी बेटियों के प्रतीक रूप में स्थापित कर वैदिक रीति से पूजन किया गया।
दक्षिण दिशा की ओर मुख करके आचार्यों के मार्गदर्शन में शीतल जल से तर्पण का विधान पूरा हुआ। समाज की इस कुरीति के लिए ईश्वर से क्षमा-याचना करते हुए पिंडों को गंगा की धारा में विसर्जित किया गया।
12 सालों में 1.5 लाख से अधिक अजन्मी बेटियों का हुआ पिंडदान
कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध वर्ष 2001 से यह संस्था जन-जागरण अभियान चला रही है। पिछले 12 वर्षों में 1.5 लाख से अधिक अजन्मी बेटियों का तर्पण, पिंडदान और पंचबलि किया जा चुका है। आयोजक ने बताया कि यह सिर्फ धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि पुत्र मोह में अंधे हो चुके माता-पिता और सोए हुए समाज की चेतना को जगाने का भी प्रयास है। पूजन आचार्य पं. दिनेश दुबे, पं. धनंजय तिवारी व पं. सीताराम ने कराया तथाव्यवस्था व पिंड निर्माण में राहुल गुप्त, हरिकृष्ण प्रेमी, जितेंद्र किरण जादूगर, भानु प्रताप, कुमारी संतोषी, गुड्डो लगे रहे।
