वाराणसी, जागरण संवाददाता। देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की दृष्टि समाज की प्रत्येक स्थिति और गतिविधियों के पड़ रहे प्रभाव पर थी। इसके लिए महामना ने विविध क्षेत्र में कार्य करने वाले व्यक्तित्वों को पहचाना और उन्हें अलग-अलग जिम्मेदारी सौंपी। समाज के आध्यात्मिक पुनरोत्थान तथा लोगों को सनातन के मूल संस्कारों से जोड़ समाज में आती विश्रृंखलता को समाप्त करने के लिए उन्होंने आंवलखेड़ा में जन्मे पं. श्रीराम शर्मा आचार्य को चुना। उन्हें काशी में गायत्री मंत्र की दीक्षा देकर गायत्री परिवार की स्थापना का मार्ग दिखाया। फिर तो आचार्य ने अपने तपोबल से जो पारिवारिक संगठन खड़ा किया कि समाज के प्रत्येक वर्ग को गायत्री महामंत्र का अभयदान दे, जप-तप, सिद्धि व यज्ञ-हवन से जोड़ समाज में आत्मबल ही नहीं उत्पन्न किया, वरन पूरे सनातन समाज को एकसूत्र में बांध लिया। आज गायत्री परिवार वैश्विक परिदृश्य में एक बड़ा आध्यात्मिक संगठन बन चुका है जो भारतीय संस्कृति व अध्यात्म विद्या की संचेतना को जन-जन तक पहुंचाने में लगा है।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पं. श्रीराम शर्मा आसनसोल जेल में पं. जवाहरलाल नेहरू की माता स्वरूपरानी नेहरू, रफी अहमद किदवई, महामना मदनमोहन मालवीय व देवदास गांधी जैसी हस्तियों के साथ बंद किए गए थे। वहीं जेल में महामना ने उन्हें आध्यात्मिक मार्ग से समाजोद्धार का संदेश दिया। साथ ही जन-जन की साझेदारी बढ़ाने के लिए हर व्यक्ति के अंशदान से, मुट्ठी फंड से रचनात्मक प्रवृत्तियां चलाने की सीख। यही मंत्र आगे चलकर गायत्री परिवार के संगठन क्रियाविधि का आधार बना। एक घंटा समयदान, बीस पैसा नित्य या एक दिन की आय एक माह में तथा एक मुट्ठी अन्न रोज डालने के माध्यम से धर्म घट की स्थापना का स्वरूप लेकर लाखों-करोड़ों की भागीदारी वाला गायत्री परिवार बनता चला गया, जिसका आधार था प्रत्येक व्यक्ति की यज्ञीय भावना का उसमें समावेश। इस प्रकार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में महामना का योगदान दिखाई देता है।

हिंदू महासभा की स्थापना : राष्ट्र के प्राण-तत्त्व हिंदू परंपरा व जीवन शैली तथा सनातन सिद्धांतों को मानने वाले महामना मदन मोहन मालवीय को कमजोर, आत्मबलहीन तथा अपनी जड़ों से कटते जा रहे समाज की दुर्दशा देखी नहीं गई। राजनीतिक स्तर पर भी कांग्रेस ने इसे अछूत पक्ष मान रखा था। यह देख महामना पंडित मदन मोहन मालवीय ने ही 09 अप्रैल 1915 को प्रयाग के कुंभ मेले में हिंदू महासभा की स्थापना की। बीएस मुंजे एवं लाला लाजपतराय जैसे राष्ट्रवादी नेता इस संगठन से जुड़े। पहला अध्यक्ष हरद्वार के राजा मणींद्रचंद्र नाथ को बनाया गया। 1916 में महामना ने इसके अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली। इनके बाद राजा रामपाल सिंह, पंडित दीनदयाल शर्मा, स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती, लाला लाजपत राय आदि विशिष्टजनों ने संगठन का नेतृत्व किया। 1937 से 1942 तक स्वातंत्र्य वीर सावरकर इसके अध्यक्ष रहे। संगठन ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में व्यापक भूमिका का निर्वहन किया।

अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन : महामना ने देश की स्वतंत्रता और सनातन धर्म की मजबूती के लिए अनेक पत्र-पत्रिकाओं का संपादन किया। कालाकांकर के देशभक्त राजा रामपाल सिंह के अनुरोध पर मालवीयजी ने उनके हिंदी अंग्रेजी समाचार पत्र हिन्दुस्तान का 1887 से ढाई वर्षाें तक संपादन किया। उन्होंने कांग्रेस के ही एक अन्य नेता पं. अयोध्यानाथ के इंडियन ओपिनियन के संपादन में भी हाथ बंटाया। 1907 ई. में साप्ताहिक अभ्युदय निकालकर कुछ समय तक उसे भी संपादित किया। यही नहीं सरकार समर्थक समाचार पत्र पायोनियर के समकक्ष 1909 में दैनिक 'लीडर' अखबार निकालकर लोकमत निर्माण का महान कार्य किया। दूसरे वर्ष मर्यादा पत्रिका प्रकाशित की। 1924 में दिल्ली आकर हिंदुस्तान टाइम्स को सुव्यवस्थित किया। सनातन धर्म को गति प्रदान करने हेतु लाहौर से विश्वबंद्य जैसे अग्रणी पत्र को प्रकाशित करवाया।

Edited By: Abhishek Sharma