बलिया, जेएनएन। पंचायत चुनाव की आहट अब गांव की गलियों से निकलकर थाने ब्लाक व तहसील तक पहुंचने लगी है। लकलक चढ़ाकर संभावित प्रत्याशी लोगों के निजी कामों के लिए मैदान में उतरने लगे हैं और इसी के साथ वर्षो से दबे रुके नाली नाबदान चकरोड के विभिन्न मामलों की तहरीरें प्रशासनिक अधिकारियों की टेबल की शोभा बढ़ाने लगी है। विगत एक माह में समूचे क्षेत्र से एक के बाद एक कई गांवों में इस तरह के संघर्षों की कहानी लोगों की जुबान पर है। सुबह सड़क और टहलने वालों से लेकर शाम को चट्टी चौराहे की चौपाल पर भी इस विषय की प्रमुखता बनी हुई है। 

 विगत दिनों राहत सामग्री के वितरण के साथ शुरू हुआ, इनके आदमी उनके आदमी का सिलसिला काफी तेजी से विचरण कर रहा है। चुनावी तनातनी का आलम ये है कि अब गांव की चौपाल पर सुलझाने वाले मामूली विवाद भी तहरीर की शक्ल लेकर थाने पहुंचने लगे हैं। आम आदमी के साथ भी एक खास की उपस्थिति है और आसानी से सुलझने वाले विवाद को भी सुलझाने में कई दिन का समय लग जा रहा है। इस राजनीतिक माहौल से जहां एक तरफ गांवों की सामाजिक समरसता खतरे में है वहीं दूसरी तरफ इसे लेकर गुटबाजी का दौर भी चरम पर हैं। 

वर्तमान प्रधानों पर भी आफत

पंचायत चुनाव की सुगबुगाहट के तेज होने के बाद सबसे बड़ा झटका वर्तमान प्रधानों को लगा है। धड़ाधड़ पंचायतों की सूचनाएं मांगी जा रही हैं और ब्लाक पर सूचनार्थियों की तादाद बढ़ गयी है औऱ सचिवों को मिले सूचना के पत्र प्रधानों के टेंशन बढ़ा रहें है। अब यह गांव के काम काज का तकाजा ही है कि लोग बड़े हनक से बता रहे हैं कि उनकी सूचना मांग ली गयी है। मनरेगा, राज्य वित्त, चौदहवां राज्य वित्त के कामों की जानकारी ऐसे मांगी जा रही है। माने इसे मांगकर प्रधान की कुंडली मांग ली गयी है। अब जिन प्रधानों को अपने कामकाज का भरोसा है उन्हें तो कुछ चैन है बाकी कुछ ज्यादा ईमानदार प्रधान इसे लेकर भी खासा परेशान हैं। ग्राम पंचायत के खर्चों का हिसाब एक ऐसा वरदान हो गया है। जिसे चुनावी समर का हर योद्धा पा लेना चाहता है। कुछ राह चलते कार्रवाइयों का भी हिसाब लगा रहें हैं कि आखिरकार मामले में कारवाई क्या होगी। तो कुछ सरेआम प्रधान की अनियमितताओं की घोषणा करते हुए चुनावी बिगुल फूंक रहे हैं।

Posted By: Abhishek Sharma

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