ऑस्टियोआर्थराइटिस : घुटनों का दर्द केवल उम्र का असर नहीं, समय पर उपचार से बच सकती है जोड़ों की कार्यक्षमता
ऑस्टियोआर्थराइटिस, जिसे जोड़ों की घिसावट की बीमारी भी कहते हैं, केवल बढ़ती उम्र का प्रभाव नहीं है। सही समय पर ...और पढ़ें

जोड़ों में दर्द के लिहाज से इसके लगातार बने रहने वाले ये लक्षण ऑस्टियोआर्थराइटिस के संकेत हो सकते हैं।
HighLights
ऑस्टियोआर्थराइटिस केवल उम्र का प्रभाव नहीं, बल्कि एक बीमारी है।
वजन नियंत्रण, व्यायाम और सही उपचार से जोड़ों की कार्यक्षमता बचाएं।
आयुर्वेद में संधिवात के लिए रास्ना, गुग्गुलु जैसी औषधियां प्रभावी।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। इन दिनों घुटनों में दर्द, सीढ़ियाँ चढ़ते समय परेशानी, सुबह बिस्तर से उठने पर अकड़न और कुछ दूर चलने के बाद जोड़ों में तकलीफ आदि समस्याएं अनेक लोगों में देखने को मिल रही हैं। अक्सर लोग इसे बढ़ती उम्र का सामान्य प्रभाव मानकर दर्द निवारक दवाओं का सहारा लेते रहते हैं। लेकिन लगातार बने रहने वाले ये लक्षण ऑस्टियोआर्थराइटिस के संकेत हो सकते हैं।
ऑस्टियोआर्थराइटिस को सामान्य भाषा में जोड़ों की घिसावट से जुड़ी बीमारी कहा जाता है। हालांकि, आधुनिक चिकित्सा के अनुसार यह केवल कार्टिलेज (उपास्थि) के घिसने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें हड्डियों, जोड़ की अंदरूनी परत, आसपास की मांसपेशियों और अन्य संरचनाओं में भी बदलाव हो सकते हैं।
सही समय पर पहचान, वजन नियंत्रण, व्यायाम और उचित उपचार से दर्द कम करने तथा जोड़ों की कार्यक्षमता बनाए रखने में महत्वपूर्ण सहायता मिल सकती है। पूर्व चिकित्सक, राजकीय आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज, वाराणसी डॉ. अजय गुप्ता ने जागरण के पाठकों के लिए समस्या ही नहीं समाधान भी बताया।
क्या है ऑस्टियोआर्थराइटिस?
हमारे जोड़ों में हड्डियों के सिरों पर चिकनी उपास्थि यानी कार्टिलेज होती है, जो गतिविधियों के दौरान घर्षण कम करने और भार को सहने में मदद करती है। ऑस्टियोआर्थराइटिस में इस उपास्थि की संरचना और गुणवत्ता में बदलाव होने लगता है। साथ ही, जोड़ के आसपास की हड्डियों में परिवर्तन, कभी-कभी सूजन और मांसपेशियों की कमजोरी भी विकसित हो सकती है।
यह समस्या मुख्य रूप से घुटनों, कूल्हों, हाथों की उंगलियों और रीढ़ के कुछ जोड़ों को प्रभावित करती है। घुटनों का ऑस्टियोआर्थराइटिस विशेष रूप से चलने-फिरने, सीढ़ियाँ चढ़ने, बैठने और उठने जैसी दैनिक गतिविधियों को प्रभावित कर सकता है।
ऑस्टियोआर्थराइटिस के प्रमुख कारण
इस बीमारी का कोई एक निश्चित कारण नहीं है। कई जोखिम कारक मिलकर इसके विकसित होने की संभावना बढ़ाते हैं।
1. बढ़ती उम्र: उम्र के साथ जोड़ों के ऊतकों में परिवर्तन होते हैं। हालांकि, हर बुजुर्ग व्यक्ति को ऑस्टियोआर्थराइटिस हो, यह जरूरी नहीं है।
2. मोटापा: शरीर का अधिक वजन विशेष रूप से घुटनों पर भार बढ़ाता है। वसा ऊतक से निकलने वाले कुछ जैविक पदार्थ भी सूजन की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।
3. पुरानी चोट: घुटने की लिगामेंट या मेनिस्कस की चोट तथा कुछ फ्रैक्चर भविष्य में ऑस्टियोआर्थराइटिस का जोखिम बढ़ा सकते हैं।
4. मांसपेशियों की कमजोरी: जांघ की मांसपेशियाँ कमजोर होने पर घुटने की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।
5. आनुवंशिक प्रभाव: परिवार में इस बीमारी का इतिहास होने पर जोखिम बढ़ सकता है।
6. काम और गतिविधियों का स्वरूप: लंबे समय तक घुटनों को मोड़कर काम करना, बार-बार भारी वजन उठाना और कुछ प्रकार की दोहराव वाली गतिविधियाँ जोखिम को प्रभावित कर सकती हैं।
ऑस्टियोआर्थराइटिस के लक्षण कैसे पहचानें?
- इसके लक्षण धीरे-धीरे विकसित हो सकते हैं और समय के साथ बदल सकते हैं।
- चलने, सीढ़ियाँ चढ़ने या लंबे समय तक खड़े रहने पर दर्द बढ़ना।
- आराम करने के बाद उठते समय कुछ देर अकड़न महसूस होना।
- सुबह की जकड़न सामान्यतः 30 मिनट से कम रहना।
- घुटनों को मोड़ने या सीधा करने में कठिनाई।
- जोड़ों से आवाज आना, जिसे क्रेपिटस (Crepitus) कहते हैं।
- घुटने के आसपास हल्की सूजन या हड्डियों के आकार में परिवर्तन।
- गंभीर अवस्था में चलने की दूरी कम होना और दैनिक कार्यों में परेशानी।
केवल जोड़ों से आवाज आने का अर्थ यह नहीं है कि कार्टिलेज घिस रही है। इसी तरह, एक्स-रे में बदलाव होने पर भी हर व्यक्ति को तेज दर्द नहीं होता। यदि जोड़ में अचानक तेज दर्द, लालिमा, अधिक गर्माहट या बुखार हो, तो इसे सामान्य ऑस्टियोआर्थराइटिस मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
ऑस्टियोआर्थराइटिस और आयुर्वेद का संबंध
आयुर्वेद में जोड़ों के दर्द, जकड़न और गतिविधियों में कठिनाई से संबंधित स्थितियों का वर्णन संधिवात सहित विभिन्न वातविकारों के अंतर्गत मिलता है। संधिवात में वातदोष की भूमिका को महत्व दिया गया है।
ऑस्टियोआर्थराइटिस में उपयोग की जाने वाली प्रमुख आयुर्वेदिक औषधियां
आयुर्वेद में विभिन्न औषधीय द्रव्यों और योगों का पारंपरिक रूप से वातविकारों में उपयोग किया जाता है। इनका चयन रोगी की स्थिति के अनुसार किया जाना चाहिए।
1. रास्ना (Rasna)
रास्ना का पारंपरिक उपयोग वात से संबंधित जोड़ों के दर्द और जकड़न में किया जाता है। रास्नासप्तक क्वाथ जैसे योगों पर भी वातविकारों के संदर्भ में विचार किया जाता है।
2. योगराज गुग्गुलु (Yograj Guggulu)
यह आयुर्वेद का एक पारंपरिक बहुद्रव्य योग है, जिसका उपयोग वातविकारों में किया जाता है।
3. महायोगराज गुग्गुलु (Mahayograj Guggulu)
इसका पारंपरिक उपयोग विभिन्न वातविकारों में मिलता है। ऑस्टियोआर्थराइटिस में इसका उपयोग चिकित्सकीय मूल्यांकन के बाद ही किया जाना चाहिए।
4. दशमूल (Dashamoola)
दशमूल का उपयोग आयुर्वेद में विभिन्न वातविकारों के प्रबंधन में किया जाता है। इसके आधार पर तैयार योग रोगी की अवस्था के अनुसार चुने जा सकते हैं।
5. हरिद्रा (हल्दी) और करक्यूमिन
हल्दी में पाए जाने वाले करक्यूमिन पर ऑस्टियोआर्थराइटिस, विशेषकर घुटनों के दर्द के संदर्भ में अध्ययन हुए हैं। कुछ परीक्षणों और समीक्षाओं में दर्द तथा कार्यक्षमता में संभावित सुधार के संकेत मिले हैं। अधिक मात्रा में करक्यूमिन सप्लीमेंट लेने से पहले चिकित्सकीय सलाह जरूरी है, विशेषकर रक्त पतला करने वाली दवाएँ लेने वाले या पित्ताशय संबंधी रोगों से पीड़ित लोगों के लिए।
खानपान और दिनचर्या में क्या बदलाव करें?
- संतुलित आहार लें, जिसमें पर्याप्त प्रोटीन, फल, सब्जियाँ और साबुत अनाज हों।
- वजन अधिक होने पर धीरे-धीरे कम करें।
- नियमित रूप से चलें और अपनी क्षमता के अनुसार व्यायाम करें।
- लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठने से बचें।
- आराम और गतिविधि के बीच संतुलन रखें।
- घुटनों में परेशानी होने पर कुर्सी से उठने-बैठने और सीढ़ियों के इस्तेमाल में आवश्यक सावधानी बरतें।
- दर्द बढ़ाने वाले व्यायाम या योगासन जबरन न करें।
किन जांचों की आवश्यकता होती है?
अधिकांश मामलों में चिकित्सक लक्षणों और शारीरिक परीक्षण के आधार पर ऑस्टियोआर्थराइटिस की पहचान कर सकते हैं। जरूरत होने पर एक्स-रे कराया जा सकता है। MRI प्रत्येक रोगी के लिए आवश्यक नहीं होता। यदि जोड़ों में असामान्य सूजन, लंबे समय तक सुबह की जकड़न या अन्य प्रणालीगत लक्षण हों, तो चिकित्सक रूमेटॉइड अर्थराइटिस, गाउट अथवा अन्य कारणों की जाँच कर सकते हैं।
जोड़ों को आराम नहीं, सही देखभाल की जरूरत है
ऑस्टियोआर्थराइटिस एक सामान्य लेकिन व्यक्ति की कार्यक्षमता को प्रभावित करने वाली बीमारी है। इसे केवल उम्र का परिणाम मानना या लगातार दर्द निवारक दवाएँ लेते रहना उचित नहीं है। आयुर्वेदिक औषधियाँ और पंचकर्म समग्र उपचार में सहायक होते हैं। नियमित व्यायाम, वजन नियंत्रण, फिजियोथेरेपी और आवश्यकता के अनुसार आधुनिक चिकित्सा को भी उचित महत्व देना चाहिए।
