ओंगे जनजाति 65 हजार वर्ष पूर्व अफ्रीका से आए प्रारंभिक होमो सैपियंस की वंशज : डा. थंगराज
वाराणसी में डॉ. कुमारस्वामी थंगराज ने बताया कि अंडमान की ओंगे जनजाति 65 हजार वर्ष पूर्व अफ्रीका से आए होमो सैपियंस के वंशज हैं। अब केवल 136 सदस्य बचे ...और पढ़ें

बताया कि औपनिवेशिक काल और पर्यावरणीय दबावों के कारण इनकी आबादी कम हो गई है।
जागरण संवाददाता, वाराणसी। अंडमान द्वीपसमूह में निवास करने वाले निग्रिटो समुदायों में से एक ओंगे जनजाति समुदाय 65 हजार वर्ष पूर्व अफ्रीका से आए होमो सैपियंस की प्रारंभिक खेप के वंशज हैं। इस जनजाति का अस्तित्व अब खतरे में है। जनजाति के महज 135 सदस्य ही अब तक बचे थे, हाल ही में एक शिशु के जन्म के बाद अब उनकी संख्या 136 हो गई है।
यह स्थिति उनकी सांस्कृतिक और जैविक अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती है। ये बातें प्रसिद्ध जेनेटिक विशेषज्ञ, सीएसआइआर-सेंटर फार सेल्युलर एंड मालिक्यूलर बायोलाजी (सीसीएमबी) हैदराबाद के भटनागर फेलो ‘विज्ञानश्री’ डा. कुमारस्वामी थंगराज ने कहीं। वह सोमवार को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के जंतु विज्ञान विभाग में आयोजित विशेष व्याख्यान श्रृंखला के अंतर्गत भारतीय उपमहाद्वीप के जीनोमिक इतिहास पर चर्चा कर रहे थे।
ओंगे जनजाति के डीएनए विश्लेषण के आधार पर डा. थंगराज ने बताया कि इस समुदाय के पूर्वज अफ्रीका से लगभग 65 हज़ार वर्ष पूर्व दक्षिणी मार्ग से भारतीय उपमहाद्वीप पहुंचे थे। यह प्रवास मानव इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जब होमो सेपियंस ने अफ्रीकी महाद्वीप छोड़कर एशिया के तटीय क्षेत्रों की ओर प्रस्थान किया, जो आधुनिक गैर-अफ्रीकी आबादी का मूल स्रोत है।
उन्होंने बताया कि ओंगे लोगों का जीनोटाइप पूर्वी एशियाई और दक्षिण-पूर्व एशियाई निग्रिटो समूहों से निकटता रखता है, लेकिन उन्होंने निएंडरथल डीएनए के न्यूनतम प्रभाव को भी उजागर किया, जो अफ्रीका से प्रवास की पुष्टि करता है। जानकारी दी कि औपनिवेशिक काल में सेलुलर जेल बनाने के दौरान अंग्रेजों द्वारा इनकी हत्या से लेकर वर्तमान पर्यावरणीय दबावों तक, ओंगे आबादी में भारी गिरावट आई है।
1901 में 672 से घटकर आज 136 रह गई है। बाहरी संपर्क, बीमारियां और वनों की कटाई उन्हें विलुप्ति की कगार पर पहुंचा चुके हैं। डा. थंगराज ने त्तराखंड के चमोली जिले में 5,020 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ‘कंकाल झील’ या ‘मिस्ट्री लेक’ के नाम से प्रसिद्ध रूपकुंड झील में मिले कंकालों के डीएनए विश्लेषण के आधार पर बताया कि ये कंकाल एक साथ मरे लोगों के नहीं हैं।
बताया कि तथ्यों के विपरीत यह कम-से-कम तीन अलग-अलग समूहों के हैं, जो लगभग 1,000 साल के अंतराल में वहां पहुंचे थे। कार्यक्रम का संचालन ज्ञान लैब की शोधार्थी देबश्रुति दास व संयोजन प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने किया। प्रो. एससी लाखोटिया, प्रो. राजीव रमन, प्रो. एके सिंह, डा. चंदना बसु, प्रो. परिमल दास, डा. ऋचा आर्य, डा. राघव, डा. गीता आदि भी थे।

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