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व‍िश्‍व मानस‍िक स्‍वास्‍थ्‍य द‍िवस: चरक संह‍िता में मन की प्रसन्‍नता को लेकर आख‍िर क्‍या कहा गया है? जान लें आयुर्वेद‍िक उपचार भी

By abhishek sharma Edited By: Abhishek sharma
Published: Thu, 08 Oct 2026 07:03 PM (IST)

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर आयुर्वेद के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य के महत्व पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें चरक संहिता ...और पढ़ें

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: आयुर्वेद और चरक संहिता से जानें मन की प्रसन्नता का रहस्य।

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: आयुर्वेद और चरक संहिता से जानें मन की प्रसन्नता का रहस्य।

HighLights

  1. चरक संहिता में मन की प्रसन्नता को स्वास्थ्य का अभिन्न अंग बताया गया है।

  2. आयुर्वेद मन और शरीर के गहरे संबंध को स्वीकार करता है, जो परस्पर प्रभावित होते हैं।

  3. नियमित नींद, संतुलित आहार, व्यायाम और प्रकृति मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। “डॉक्टर साहब, शरीर तो बिल्कुल ठीक है, लेकिन मन हमेशा बेचैन रहता है। किसी काम में मन नहीं लगता, नींद ठीक नहीं आती और छोटी-छोटी बातों पर चिंता होने लगती है।” आजकल ऐसी शिकायतें बहुत सामान्य हो गई हैं।

आधुनिक जीवनशैली, काम का दबाव, आर्थिक और पारिवारिक चिंताएं, सोशल मीडिया, नींद की कमी और लगातार मानसिक तनाव हमारे मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं।

प्रत्येक वर्ष 10 अक्टूबर को World Mental Health Day यानी विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना और मानसिक रोगों से जुड़े असर को कम करना है।

आयुर्वेद ने बहुत पहले समझ लिया था—स्वास्थ्य केवल शरीर का विषय नहीं है
राजकीय आयुर्वेद महाविद्यालय, वाराणसी के पूर्व चिकित्सक वैद्य अजय गुप्ता के अनुसार आज आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में मानस‍िक स्‍वास्‍थ्‍य को शारीरिक स्वास्थ्य जितना ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लेकिन भारतीय चिकित्सा परंपरा में मन और शरीर के संबंध पर बहुत पहले से गंभीरता से विचार किया गया है।

आयुर्वेद की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है कि उसने स्वास्थ्य को केवल शारीरिक रोगों की अनुपस्थिति तक सीमित नहीं रखा। शरीर के साथ मन की अवस्था, इंद्रियों और आत्मा की प्रसन्नता को भी स्वस्थ जीवन का अभिन्न हिस्सा माना गया।

चरक संहिता में स्वस्थ व्यक्ति का वर्णन करते हुए कहा गया है—
“समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते॥”
अर्थात् केवल दोष, अग्नि, धातु और मल की सामान्य अवस्था ही पर्याप्त नहीं है। व्यक्ति के आत्मा, इंद्रिय और मन की प्रसन्नता भी स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

यही कारण है कि आयुर्वेद में मानसिक स्वास्थ्य को शरीर से अलग करके नहीं देखा गया। मन और शरीर एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। लंबे समय का तनाव नींद और पाचन को प्रभावित कर सकता है, जबकि शारीरिक बीमारी भी व्यक्ति की मानसिक अवस्था को प्रभावित कर सकती है।

आयुर्वेद ने मानसिक अवस्था को समझने के लिए सत्त्व, रजस् और तमस् जैसे मन के गुणों का वर्णन किया। इसके अलावा चिंता, भय, शोक, क्रोध, मोह और मानसिक तनाव जैसी अवस्थाओं तथा उनके शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों का भी वर्णन मिलता है।

इस दृष्टि से आयुर्वेद का स्वास्थ्य-विचार अत्यंत व्यापक है—स्वस्थ शरीर के साथ स्वस्थ मन और प्रसन्न जीवन।

आज जब दुनिया World Mental Health Day के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने की बात कर रही है, तब आयुर्वेद की यह समग्र दृष्टि हमें याद दिलाती है कि मन की देखभाल स्वास्थ्य का कोई अलग विषय नहीं है।
मन स्वस्थ है तो स्वास्थ्य अधूरा नहीं; और मन की उपेक्षा करके पूर्ण स्वास्थ्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

आयुर्वेद मन को कैसे देखता है?
आयुर्वेद में स्वास्थ्य केवल शरीर के स्वस्थ होने का नाम नहीं है। स्वस्थ व्यक्ति की परिभाषा में मन की प्रसन्नता और मानसिक संतुलन को भी महत्वपूर्ण माना गया है।

आयुर्वेद मन में मुख्यतः तीन गुणों—सत्त्व, रजस् और तमस्—का वर्णन करता है।
सत्त्व मन की शांति, स्पष्टता, विवेक और संतुलन से जुड़ा है।
रजस् अत्यधिक गतिविधि, बेचैनी, उत्तेजना और मानसिक अस्थिरता से संबंधित हो सकता है।
तमस् जड़ता, उदासीनता, निष्क्रियता और मानसिक भारीपन से जुड़ा माना जाता है।
जब जीवनशैली, आहार, नींद और मानसिक परिस्थितियों के कारण मन का संतुलन बिगड़ता है, तो चिंता, तनाव, अनिद्रा और मनोदशा में परिवर्तन जैसी समस्याएं दिखाई दे सकती हैं।

लगातार तनाव को नजरअंदाज न करें
थोड़ा तनाव जीवन का सामान्य हिस्सा है। लेकिन जब तनाव लंबे समय तक बना रहे और व्यक्ति के काम, पढ़ाई, रिश्तों, नींद या दैनिक जीवन को प्रभावित करने लगे, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए।
कुछ संकेत हैं—

लगातार उदासी या खालीपन महसूस होना

किसी काम में रुचि न रहना

अत्यधिक चिंता या बेचैनी

नींद का बहुत कम या बहुत अधिक हो जाना

भूख और वजन में बदलाव

हमेशा थकान महसूस होना

ध्यान लगाने में कठिनाई

सामाजिक गतिविधियों से दूर होना

स्वयं को बेकार या दोषी समझना

यदि ये लक्षण लगातार बने रहें, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेना उचित है।

आयुर्वेद में मानसिक स्वास्थ्य के लिए क्या महत्वपूर्ण है?
आयुर्वेद में मानसिक स्वास्थ्य के लिए केवल औषधि पर जोर नहीं दिया गया है। आचार, आहार, निद्रा और दिनचर्या का भी महत्वपूर्ण स्थान है।
1. पर्याप्त और नियमित नींद
देर रात तक मोबाइल चलाना, अनियमित सोना और लगातार नींद पूरी न करना मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
सोने और जागने का समय यथासंभव नियमित रखें। सोने से पहले स्क्रीन टाइम कम करें और शांत वातावरण बनाएं।
2. नियमित व्यायाम और योग
नियमित शारीरिक गतिविधि तनाव कम करने और mood को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।
योगासन, प्राणायाम और ध्यान मानसिक शांति के लिए उपयोगी हो सकते हैं। शुरुआत हमेशा अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार करें।
3. संतुलित आहार
आयुर्वेद में सात्त्विक और हितकर आहार को मन के संतुलन के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।
ताजे फल, सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, पर्याप्त protein और उचित मात्रा में healthy fats को भोजन में शामिल करें। अत्यधिक processed food, alcohol और excess caffeine का सेवन कम करना भी उपयोगी हो सकता है।
4. प्रकृति और सामाजिक जुड़ाव
लगातार अकेले रहना और केवल मोबाइल या सोशल मीडिया की दुनिया में रहना मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।
परिवार और मित्रों से बातचीत करें। कुछ समय प्रकृति में बिताएं। अपनी रुचि के कार्यों के लिए समय निकालें।
5. प्राणायाम और ध्यान
अनुलोम-विलोम, भ्रामरी तथा शवासन जैसे कर्म कुछ लोगों में तनाव और चिंता को कम करने में सहायक हो सकती हैं।

आयुर्वेद की कुछ औषधियां
आयुर्वेद में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न संदर्भों में मेध्य रसायन और अन्य औषधियों का वर्णन मिलता है। उदाहरण के लिए ब्राह्मी, मण्डूकपर्णी (गोटू कोला), अश्वगंधा और यष्टिमधु जैसी औषधियों का पारंपरिक रूप से उपयोग किया जाता रहा है।
लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि हर व्यक्ति के लिए एक ही औषधि उपयुक्त नहीं होती।
औषधि का चुनाव व्यक्ति की प्रकृति, विकृति, आयु, नींद, पाचन, अन्य रोगों और वर्तमान दवाओं को ध्यान में रखकर चिकित्सक द्वारा किया जाना चाहिए। इसलिए वैद्य की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
आयुर्वेदिक औषधियां ज्यादा सुरक्षित है और लंबे समय तक ली जा सकती हैं।

समाज में आज भी ड‍िप्रेशन और एंजाइटीया अन्य मानसिक समस्याओं को लेकर कई गलत धारणाएं हैं।
“अपने आप ठीक हो जाएगा।”
“ज्यादा सोचता है।”
“मन मजबूत करो।”
“यह तो केवल वहम है।”
ऐसी बातें समस्या को कम नहीं करतीं, बल्कि व्यक्ति को मदद लेने से रोक सकती हैं।
मानसिक रोग भी स्वास्थ्य की समस्या है और इसका उपचार संभव है। इसलिए ज्यादा देरी नही करते हुए जल्दी ही वैद्य से परामर्श लेना चाहिए।

आयुर्वेद हमें याद दिलाता है कि स्वास्थ्य केवल शरीर का विषय नहीं है। शरीर, मन, इंद्रियों और जीवनशैली के बीच संतुलन ही वास्तविक स्वास्थ्य की आधारशिला है। इस विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर संकल्प लें क‍ि अपने मन की परेशानी को छिपाएंगे नहीं। जरूरत पड़ने पर बात करेंगे। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेंगे। और अपने मानसिक स्वास्थ्य को उतना ही महत्व देंगे, जितना अपने शारीरिक स्वास्थ्य को।